रिश्ते दार 🎩

तुमने मुझसे पूछा आज
क्या होता है रिश्ता ?
किसको कहते रिश्तेदार ?
दिल से दिल की बात हुई जब,
तब रिश्ते बन जाते हैं।
इन रिश्तों को तोड़ें जो
वो रिश्तेदार कहलाते हैं।

*(यहां कविता में रक्त सम्बन्धी रिश्ते के बारे में चर्चा नहीं है।यहां समाज में रिश्तों की दारी(रौब) जो दिखाते हैं । )

दादी का गीत ।🎼🎵🎶

मोबाइल चुपके चुराय गयो रे।
मैया मेरो कंनहिया ।
दिल में बस्ती बसाए गयो रे।
मैया मेरो कंनहिया।
झटपट मोरी दवाई निकारे ।
डॉक्टर बनिके अखियन में डारे।
ओ मैया,
“चश्मा”! देखो. छिपाय गयो रे।
मैया मेरो कंनहिया।
दिल में बस्ती बसाए गयो रे
मैंया मेरो कंनहिया ।
पुलिस वालो बनिके ये आवै।
दरोगा सा मोपे रौब दिखावे।
ओ मैया
डंडा मोपै ही चलाय गयो रे ।
मैया मेरो कन्हइया।
दिल में बस्ती बसाए गयो रे
मैया मेरो कंनहिया।
रसिया देखो प्यार जतावै।
भोला बनिके पप्पी दे जावै,…
ओ मैया,
दोस्त मोहे बनाय गयो रे।
मैया मेरो कंनहिया ।
दिल में बस्ती बसाय गयो रे
मैया मेरो कंनहिया।
‘एलिसा’कहि के मोहे पुकारे ।
रौब मोपे ऐसो है झारे ।
ओ मैया अपने को
प्रॉफेसर – यूजीनियस बताए रयो रे।
मैया मेरो कंनहिया।
दिल में बस्ती बसाय गयो रे ,
मैया मेरो कंनहिया ।
मोबाइल देखो चुराय गयो रे
मैया मेरो कंनहिया।
चश्मा देखो छुपाय गयो रे
मैया मेरो कंनहिया।
डंडा मोई पे चलाय गयो रे
मैया मेरो कंनहिया।
दोस्त मोहे बनाय गयो रे
मैया मेरो कंनहिया।
प्रोफेसर ‘यूजीनियस’ बताय रयो रे
मैया मेरो कंनहिया। ✍️

गुमशुदा सा दर्द । 😢

ये दर्द दूसरे का कहीं
खो सा गया है ।
कोई भी उसे ढूंढता नहीं,


वो गुम सा गया है।
शहरों को तराशते हुए,
धोखा मिला जिसे,
वो राह में थका हुआ सा,
कहीं सो सा गया है।


‘मजदूर’ नाम दिया जिसे,
मजबूर था बहुत,
राहें वो अपने गाँव की,
फिर ढूंढता सा है।


राक्षसों की दुनियां में
जो देवता फंसा ,
वो शिव की तरह बचता
भस्मासुर से कहीं ।


ये अश्रु पुष्प मेरे
उन चरणों में देव के
जो सुदामा सा थका
कलियुग में कराहता हुआ कहीं ।


ये दर्द दूसरे का कहीं
खो सा गया है।
कोई भी उसे ढूंढता नही
वो गुम सा गया है ।✍️

याचना। 🙏

कितना अच्छा होता भगवन, तुम थोड़ी शक्ति देते ।

दूजा दिन आते ही हम भी, पहला दिन डिलीट करते ।

वर्षों तक न जाने क्यों,कुछ बातें पीछा करतीं हैं ।

जितना भी आगे बढ़ जाएं, छाया बन कर चलती हैं ।

कुछ अपने संग चलते चलते ,जीवन के थे छन्द हुए ।

मानो उन छन्दों के पन्ने तेज हवा से बन्द हुए।

बस यूँ ही कुछ ऐसे लम्हें, हम भी तो भूला करते।

दूजा दिन आते ही हम भी,पहला दिन डिलीट करते।✍️

जश्न ए ज़िंदगी ।📯🎷💝

तेरा- मेरा मेरा-तेरा,
इसी जन्म का प्रश्न है।
फिर तो देखो जब जाएंगे ,
मनता फिर भी जश्न है ।
दुनिया में आने के छै दिन
बाद हमारी छटी मनी।
जाने के बस तीन ही दिन में,
होने लगी उठावनी।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा ,
इसी जन्म का प्रश्न है….।
आने के महीनों तक देखो,
खुशी मनाई जाएगी ।
पर जाने में कुछ दिन तक ही ,
एक दिया जल जाएगा।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा,
इसी जन्म का प्रश्न है … ।
अन्नप्रासन का जश्न मने तब,
सब पूछे क्या खाएगा ,
और तेरहवी प्रश्न ये पूछे,
पंडित क्या बनवाएगा ।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा,
इसी जन्म का प्रश्न है…..
बड़े हुए जब परिचय ‘ ये हैं ‘
कह कर जाना जाएगा ।
जाने पर’ ‘ये वो थे’ कह कर ,
हमको पहचाना जाएगा।
तेरा- मेरा मेरा- तेरा
इसी जन्म का प्रश्न है…..
जीते जी हर परिचय में,
हाथ मिलाया जाएगा ।
जाने पर हर परिचय में ,
तस्वीर पे रुख हो जाएगा ।
कोई कब्र में और कोई,
चिता-भस्म हो जाएगा।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा,
इसी जन्म का प्रश्न है ।
इसीलिए जब तक जिंदा हैं ,
जश्ने- जिंदगी मनाए हम ।
धरम- भरम की बात छोड़ ,
इक प्रेम- रंग रंग जाएं हम । ✍️

एक थी मुनियाँ 👩👩‍👧‍👦

T.V.news में पैदल चलते मजदूरों को जितनी बार देखती हूँ , मुनियां की याद आ जाती है।
नया सरकारी आवास मिला था हमें । घर में प्रवेश करते ही घर के बगीचे में दीवार से सटे चांदनी के पेड़ पर नजर पड़ी तो एक डाल पर बैठी थी वो । ये ही 9-10 साल की रही होगी ।फ्रॉक पहने, घुंघराले बाल, सांवले रंग की हंसती हुई सी । हमने कहा था नीचे उतरो। कहां से आई हो ? अभी गिरोगी तो चोट लगेगी नीचे क्यारी की ईंटे हैं । क्या नाम है तुम्हारा ? एक ही बार मे नीचे कूद गई थी वो । बहुत भोलेपन से बोली मैं मुनियां हूँ। मेरी माँ यहां काम करती है । आप नए आए हो ? इस घर की पहले वाली आंटी बहुत अच्छी थीं। फिर वो मेरे दोनो बच्चों को देख कर मुस्कुराईं थी । एक अनौखा सा अपना पन था उस बच्चे में, शायद इस आवास में पहले रहने वाली आंटी के स्नेह के कारण ..। उसकी माँ हमारे घर काम करने लगी थी और मुनियां मेरे दोनो बच्चों को देखा करती । इस काम के लिए उसे ही रख लिया था हमने ।
देखते ही देखते मुनियाँ बड़ी होने लगी थी। माँ 15 वें साल में उसे गांव ले गई थी। जब लौटी तो बड़ी सी बिंदी , मांग में सिन्दूर और हाथों में चूड़ियां पहने थी । उसे देखते ही मैंने आश्चर्य से पूछा तो बोली माँ ने मेरी शादी कर दी है । लड़का गाड़ी चलाता है। बहुत पैसा मिलता है वहाँ । मैने पूछा उसको नही लाई ? वो बड़े भोलेपन से बोली जब गौना होगा तब आएगा। बम्बई में रहता है । कुछ महीने बाद मुनियां की माँ को अपने गांव के रिश्तेदार से पता चला कि लड़का ट्रक दुर्घटना में मारा गया था। उस दिन से मुनियाँ बहुत गंभीर सी हो गई थी । माथा बिंदी के बिना सूना सा हो गया था। उसकी भाभी ने जल्दी ही दूसरा लड़का ढूंढ लिया था। घर से कुछ ही दूरी पर रहने वाले बिहारी लड़के से ही उसका विवाह हो गया था। इस बार उसके लिए हमने भी खूब सामान खरीद कर दिया था। चार पहिये वाले ठेले पर रख खुला समान दहेज कह कर ले जाया गया था । अबकी बार बिना गौने के वो ससुराल पहुंचा दी गई थी।
विवाह के कुछ महीने बाद वो मिलने आई थी । चेहरे में पहला सा उत्साह नही था बोली, “आंटी बहुत पीता है और फिर मारता है ।” मुनियाँ की माँ शायद सब समझती थी इसीलिए मुनिया को वापस घर ले आई थी । वो बीमार सी हो गई थी ।शहर के डॉक्टर को दिखाया था उसने । कई बार उसकी झुग्गी झोपड़ी में उसे देखने जाती तब वो स्वयं ही उठ गिलास में मेरे लिए पानी ले आती । उस बच्चे के हाथ का पानी ना जाने क्यों बहुत मीठा लगता था ।
उस दिन मुनियाँ की माँ को गांव जाना था। बोली मुनियाँ को इलाज के लिए बिहार ले जाना है। वहाँ झड़वा देंगे ठीक हो जाएगी । बस 10 दिन की छुट्टी दे दीजिए ।
लगभग एक महीने बाद मुनियाँ की माँ अकेली लौटी थी अपने गाँव से । बोली मुनिया नहीं रही।
आज भी विश्वास नही होता कि मुनियाँ रही नहीं। लगता है मुनियाँ के गांव जाकर उसे ले आऊं । जब कभी उस से कहती थी मुनियाँ तेरा गाँव देखना है। वो हंस कर कहती , ” बिहार में है मेरा गाँव ,आप नहीं चल पाओगे आँटी गाड़ी से उतरने के बाद बहुत दूर तक पैदल चलना पड़ता है तब जो आता है मेरा गांव ।”
आज न जाने क्यों सड़कों में चलते मजदूरों के बीच मुनिया भी कहती सी दिखती है, देख लो आंटी इनके पैर कितने दुखते होंगे । गाँव शहर से कितना दूर होता है ना? मुनिया का अनकहा ,अनसुना ,आंतरिक दर्द इन मजदूरों को अपने गावों की ओर जाते देख, महसूस करती हूँ। लगता है मैं भी इनके साथ-साथ एक दूरी तय कर रही हूँ ।✍️

फिर से माँ की याद आ गई ।💝

बाथरूम में फिसली जब मैं ,
“ओ माँ” कह कर जो चिल्लाई।
आँखों से बह निकले आँसू ,
फिर से माँ की याद आ गई।
अलमारी खोलूं जो अपनी,
रंग बिरंगे कपड़े देखूं ।
तरह तरह के सूट मैं देखूं।
देखी जब हेंगर में साड़ी,
फिर से माँ की याद आ गई।
टीवी खोलूं जब अपना मैं,
मन ले डोलूं ये अपना मैं।
जो मन चाहे चैनल देखूं,
न्यूज़ मैं देखूं व्यूज भी देखूं ।
पर जब आया गीत पुराना,
फिर से माँ की याद आ गई।
सुबह सवेरे जब उठ जाऊं ,
पौधों में पानी दे आऊं।
तरह तरह के पौधे देखूं ,
हरी भरी बेलों को देखूं।
देखा जब तुलसी का पौधा,
फिर से माँ की याद आ गई।
सुबह सुबह कुछ व्यस्त रहूं में।
घर कामों में मस्त रहूं मैं ।
पूजा घर का मान मैं करके,
ईश्वर का फिर ध्यान मैं करके,
बैठी जब पूजा चौकी पर,
फिर से माँ की याद आ गई।
फिर से माँ की याद आ गई ।✍️

शनि शिंगणापुर 🙏

पिछले वर्ष महाराष्ट्र में कई मंदिरों के दर्शन पाने का आशीर्वाद मिला। ‘शनि शिंगणापुर’ जाकर एहसास हुआ कि व्यक्ति केवल इस देवता से डरता है शायद । सबसे हटकर था यह मंदिर । ना कोई प्रवेश शुल्क, ना कोई चढ़ावा ,न कोई पुलिस हजारों की भीड़ क्रम बद्ध पंक्ति, फिर भी अनुशाशन इतना कि सब की नजर केवल शनि महाराज पर थी । दर्शनीय था वो मंज़र वो सादगी वो ‘श्रद्धा’ वो अनुशासन। साक्षात न्याय के देवता की उपस्थिति का अहसास कभी ना भूल पाने वाला क्षण बन गया ।✍️

माँ भी कभी….

माँ भी कभी
लड़कियों सी रही
होगी।
बेटी छोटी सी
अपने माँ के
घर,
अल्हड़ रही होगी।
उछलती कूदती होगी।
पिता की ‘बेटा’ आवाज,
कान में गूंजती होगी।
फिर…..
“उस सुबह” से पहले,
रात में अग्नि के फेरे ,
उसे अनजान राहों पर,
कहीं
तेजी से ले जाते।
जैसे घर का इक पौधा,
कही जाकर लगा आते ।
वसीयत जिंदगी भर की ,
किसी के नाम लिख आते ।
उसे नए नाम दे जाते
कोई भाभी कोई चाची
कोई ताई भी कह जाते।
वो अग्नि के फेरे ,
जादू सा कर जाते ।
नया जन्म है तेरा
कानो में कह जाते ।…. ✍️

मैं खुद से खेलूं रे।💃👓🖼️

आँख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछूँ आ जाऊं ? फिर आजा बोलूं रे।
मन, मोबाइल, चश्मा मेरे बन गए साथी रे ।
इन अपने संगी साथी बिन, कैसे रहलूं रे ।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछूँ आ जाऊँ ? फिर आजा बोलूं रे ।
बोले चश्मा कहाँ छुपा मैं, ढूंढ ले मुझको रे ।
ढूँढू उसको इधर उधर फिर पा लिया बोलूं रे।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछुं आ जाऊं? फिर आजा बोलूं रे।
मोबाइल भी चुप छुप देखो , मुझे सताए रे।
कहां छुपा हूँ ढूंढो मुझको, धुन में गाए रे ।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे ।
खुद से पूछुं आ जाऊँ ? फिर आजा बोलूं रे ।
इधर भी देखूं उधर भी देखूं, किधर है बोलूं रे।
तकिया – नीचे पा जाऊं फिर, पा गया बोलूं रे।
आँख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूँ रे ।
खुद से पूछुं आ जाऊं ? फिर आजा बोलूं रे। ✍️