एक थे वकील साहब।💔

अपने बालकनी में थोड़ी देर बैठी ही थी तो खुरपी की आवाज आई। कितने दिल के करीब सी लगी ये आवाज ….माली नीचे घास निकाल रहा था । जमीन से हमारे 1st फ्लोर की ऊंचाई अधिक नहीं है ।बहुत अलग हैं ये अपार्टमेंट वाले शहर ….उस शहर से जिसे छोड़ आये हैं हम। मैंने अपनी आदत के अनुसार माली से उसका नाम पूछ ही लिया। उसने अपना नाम दीपक बताया । न जाने क्यों ये दीपक शब्द उस मोहन को बहुत पास ले आया।

मोहन जिसे सभी ”मोहन पागल’ कहते थे । अपने 10 भाइयों में से एक था। पिता हाईकोर्ट में जज थे। सभी अच्छी पोस्ट पर थे पर हमारे वकील साहब(मोहन) PWD कार्यालय में लेबर पोस्ट में पदस्त थे। साईकल में लगभग 8-10 किलोमीटर दूरी से वे हमारे घर आते । दुबले पतले वकील साहब की जेब में एक डायरी और एक पेन अवश्य रहता और हाथ में एक रुकी घड़ी... पर चमचमाती हुई । घर के गेट में पहुंचते ही वे अपनी साईकल की घण्टी बहुत जोरों से और लगातार बजाते जाते। घर आते ही पिछले रास्ते में वे अपने जूते मोजे पेंट कमीज उतार बरमुडास पहने, खुरपी उठाते और क्यारी की सफाई में लग जाते । मेरे ससुरजी ने बताया था मोहन बहुत सम्पन्न घर का है लेकिन दिमाक से कमजोर है ।

तब हमारा घर वकील साहब के घर से कुछ दूरी पर था। अपने विवाह के कुछ दिनों बाद मैंने उन्हें देखा था । आते ही मेरे पैर छुए थे उन्होंने। घर के लोगों में से किसी की आवाज आई मोहन पागल आया है।
बड़े sincere थे अपने वकील साहब …. पर अक्सर कहते भाभी मैंने पढ़ाई नहीं की । पूछने पर क्यों नहीं की तो कहते ,”स्कूल में चुन्नी लाल मास्टर बहुत मारता था ,मैने भी अपनी स्लेट उन के सिर में दे मारी और भाग आया। उन्होंने मेरा स्कूल से नाम ही काट दिया था। लेकिन कोर्ट में मुझे सब जानते हैं।” तबसे ही मैने उन्हें “वकील साहब” नाम दे दिया था।
वकील साहब गाना बहुत अच्छा गाते धुन हूबहू गाने जैसी लेकिन शब्द गाने में वे अपने मन के डाल देते थे। उनके इस शौक के कारण हमने उन्हें एक ट्रांज़िस्टर उपहार में दिया था। जिसे वे अपनी साईकल के आगे टोकरी में रख कर लाते और काम करने के साथ साथ वे उसे अपने पास रख गाने सुनते।
खाने में उन्हें दाल चावल के साथ खूब नमक और लाल मिर्च पाउडर चाहिए होता। कभी कभी वकील साहब नाराज होने पर जोर से मुझ पर चिल्लाते ‘,मुझे रौब मत दिखाना भाभी । मैं इस घर में तुमसे पहले आया हूँ ।’उनकी इस धमकी से निकटता और बढ़ जाती।

वकील साहब के एक भाई का बहुत बड़ा ,'साउथ कैफ़े' मेले में लगा था । एक बार हम उनके कैफे में गए थे ।वहाँ मेले में मेरी बेटी की कैप कहीं गिर गई थी । लोगों से खचाखच भरा था वह कैफे। जब वकील साहब को उनके कैफे में जाने की बात बताई और बातों ही बातों में बेटी के केप खोने की भी बात हो गई थी क्यों कि रास्ते में दिसम्बर जनवरी की ठंड थी । मालूम न था कि वकील साहब उस केप को लौटाने के लिए अपने घर वालों से ही उलझ जाएंगे । दूसरे दिन उनके कैफ़े से फोन आया.....मिसेस पंत आपका कौन सा समान रह गया ? ये मोहन जिद पर है कि उनका सामान लौटाओ। तब मैंने उन्हें कहा कि मेरी बेटी की एक छोटी सी मंकी कैप जो मेले में कहीं गिर गई थी । शायद वकील साहब(मोहन) के मन में वो बात बैठ गई थी। बड़े sensitive लगे थे तब वकील साहब ।

मेरे भाई आनंद जब भी हमसे मिलने आते वो वकील साहब से बड़े प्यार से बातें करते उनका हाल चाल पूछते। तब वकील साहब का चेहरा खुशी से अलग ही दमकने लगता।
एक बार मैंने बातों ही बातों में उनसे कहा कल मेरी छोटी बहन गुड्डी आगरा से आ रही है। वकील साहब जरा गमलों में भी कलर कर देना । वे तन्मयता से उस काम में लग गए । घर जाते समय वकील साहब ने पूछा गुड्डी कौन सी ट्रैन से आ रही है ? मैं बोली शताब्दी से। दूसरे दिन वे थके हुए से आए बोले भाभी सब डिब्बों में देखा ट्रैन जल्दी निकल गई फिर ताज के हर डिब्बे में देखा । गुड्डी नहीं आई …. मैं बोली वो तो आ गई। आओ वकील साहब अंदर आओ। वो गुड्डी के पास जमीन पर बैठ गए और कुछ इस तरह से पूछने लगे, ‘कैसी हो ?’ ….जैसे बहुत समय से जानते हों । वो दूसरे दिन भी जल्दी घर आ गए । गुड्डी के साथ साथ मुस्कुराते हुए उसके आगे पीछे चलते । बहन थोड़ा डर सी गई थी । लगातार पीछे पड़ से गए थे वकील साहब।
अगले दिन जब वे आये, तब बहन वापस चली गई थी । वे बहुत निराश थे । रुंवासी सी आवाज में बोले हम 10 भाइयों की एक ही बहन है गुड्डी ,जो शादी के बाद एक बार भी मुझसे नही मिली ।अबकी बार भी गुड्डी मुझसे बिना मिले चली गई।
…..तब पहली बार लगा था वकील साहब में दिमाक की कमजोरी तो है लेकिन ….रिश्तों से न मिले स्नेह का दर्द भी है । मुझे नहीं मालूम था कि वकील साहब की छोटी बहन भी है।
भले ही लोग मोहन को मोहन पागल के नाम से बुलाते थे । लेकिन धीरे धीरे वे इस कैंपस में वकील साहब के नाम से मशहूर हो गए थे । अपने वकील साहब ….बहुत वफादार, ईमानदार अत्यंत भावुक और अपने अंदर कहीं दबा सा अथाह बहन का प्यार, इंतज़ार लिए हुए थे। हाँ इस दुनिया की चतुराई से बहुत दूर थे अपने वकील साहब ।

पिछले साल पता चला , वकील साहब अपने कमरे में ही शांत पड़े मिले थे । दो तीन दिन पूर्व कुछ लोगों ने उन्हें शाम को साईकल में आते देखा था। डॉक्टर के अनुसार उन्हें ठंड के कारण निमोनिया हो गया था । 😪 ✍️

Mohan, “the laywer Sir”

When I was sitting in my balcony for a while, the sound of scurrying came. How close was this voice to my heart …. The gardener was removing the grass below. The height of our 1st floor from the ground is not high. This apartments city is very different from that city which I left. According to my habit, I asked the gardener his name. He told his name , Deepak. Don’t know why this word Deepak brought that “Mohan” very close to me.

Mohan, whom everyone called ‘Mohan mad ‘, was one of his 10 brothers. His father was a judge in the Court. All were on good post but our lawyer Sir (Mohan) was in the labour post in PWD office .
He used to come to our house on cycle from about 8-10 kilometers away. He always had a diary , a pen in his shirt’s pocket and a shining but stopped watch in his wrist.
As soon as he reached the gate of our house, he used to ring his cycle bell very loudly and continuously. Entering our home, from the back side, he would take off his shoes, socks, paint shirt, put on Bermudas, pick up the scabbard and used to start the gardening task.
My father-in-law had told me that Mohan belongs to a very prosperous family but he is some what weak in mind.
That time our house was at some distance from the lawyer- Sir house. I saw him a few days after my marriage. He came to me and greeted me by touching my feet . The voice of someone in the house came, ‘Mohan mad has come to meet ‘.
What a great sincere our lawyer -Sir was…. He often said , I did not study. When asked why not, he replied , “Chunni Lal master used to beat a lot in school, I also hit my slate in his head and ran away. He had cut my name out of school. But you know bhabhi ,in court every body knows me. Since then I had given him the name ,”lawyer- Sir “.
The lawyer- Sir used to sing the songs very well, but he used to put his mind in singing the words. For his interest in music I gave him a transister.
In food, he always needed a lot of salt and red chili powder along with lentils and rice. Sometimes when he got angry, he would shout loudly at me, ‘Don’t show me your pride, bhabhi. I have come to this house before you.’
One of his brother used to have a big ‘ Cafe house ‘ in the fair. Once we also went to his cafe. My daughter’s cap had fallen somewhere in the fair. The cafe was packed with people. In the next day we told the lawyer-Sir about going to his cafe and by the way there was talk of losing the cap of the daughter because it was too cold in December-January.
It was not known that the lawyer would get involved with his family members to return that cap. The next day I got a call from his cafe, which one is yours, Mrs Pant? It is on Mohan’s insistence to return your goods.Then I told them that a small monkey cap of my daughter had fallen somewhere in the fair. Perhaps that thing had settled in the mind of the lawyer-Sir Oh how sensitive he was …. .

Whenever my brother Anand came to meet us, he used to talk to the lawyer Sir (Mohan) with great love and inquired about his condition. Then the lawyer’s face began to glow with happiness. Once I told him that , tomorrow my younger sister Guddi is coming from Agra. Lawyer -Sir, please colour all the flower - pots too. He diligently engaged in that work. While going home, the lawyer asked which train is Guddi coming from? I said from the Shatabdi . The next day when Lawyer came , was looking very tired and told me , "I saw in all the coaches the train Shatabdi left early and then looked in every compartment of the Taj train Guddi was no there..

I said , she has come. Come on, lawyer -Sir, come in. He sat down on the ground beside Guddi and started asking something like this, ‘How are you?’ Like he had known her for a long time.
Next day he came our home very early . Smiling along with Guddi, walk in front of her. Sister was a little scared. Lawyer- Sir was following her .
When he came the next day, the sister had gone back to Agra. The lawyer was very disappointed. He said in a rumbling voice that Guddi is the only sister of 10 brothers, who did not meet me even once after her marriage. This time also Guddi went away without meeting me. He looked very emotional. Then for the first time i felt that there is weakness of mind in the lawyer, but there is also the pain of affection, which he did not found in relationships. I did not know that the lawyer Sir also had a younger sister.

Even though people used to call Mohan by the name of Mohan mad . But gradually he became famous in our campus by the name of Lawyer Sir . He was very loyal, honest, sincere ,emotional ,buried somewhere deep inside waiting for the unfathomable sister’s love. Yes, he was far from the cleverness of this world……
Found out last year, the lawyer Sir was no more he was found quiet in his room. Just before two three days people saw him coming in cycle . According to the doctor, he died due to cold and pneumonia.💔✍️

स्नेह बंधन। 💕

इतना प्यार दिया तुमने,
सब आँसू सूख गए
मेरे सब आँसू सूख गए।

क्या रिश्ता है मेरा तुमसे,
कभी न जाना,
पर जबसे माना बस,
तुमको अपना माना।
दिल का होता दिल से रिश्ता
कैसे बता गए।

इतना प्यार दिया तुमने
सब आँसू सूख गए……

मौसम था पतझड़ का
मैं थी मेरे आँसू थे।
ना जानूँ कब तुम आए थे ,
सींचा तुमने पतझड़ इतना
पत्ते हरे हुए।

इतना प्यार दिया तूमने
सब आँसूं सूख गए….

जबसे देखा इस सपने को,
बहुत अलग पाया अपने को।
तुम ही थे बस तुम ही,
जबसे तुम आए थे।
और न कोई भाया था,
बस तुम भाये थे।
दुख लेने सुख देने का
एहसास जगा गए ।

इतना प्यार दिया तूमने
सब आँसूं सूख गए….
मेरे सब आंसू सूख गए। ✍️

In short.,😀😀😀

World is very beaufiful.🌹the distribution of labour in side our body tell us about the justice of God.All our body parts are doing their given work very silently since our birth .इसीलिए कभी कभी अपने शरीर में स्वयं प्रवेश कर heart, lungs, lever , brain,muscles etc से hello कर पूछती हूँ कहीं थके तो नहीं ? फिर उनकी आवाज सुनती हूँ , नहीं इसकी चिंता मत करो,we are very busy in our duty .आप बस माल अंदर अच्छा और समय पर भेजते रहो।” मैं अभी बाहर आकर बढ़िया पकौड़ी और घर का दही फेंट कर कड़ी बनाने की पूरी तैयारी कर आई हूँ ।👍😄✍️

उसका भय ।😲😒

आज facebook में उसे देखा युवा हो गया है । नाम पढ़ते ही वो बच्चा याद आया।सीधा-सादा भोला -भाला सा वो महा राष्ट्रीयन बच्चा । मैं क्लास टीचर थी उसकी । एक कमजोरी थी मुझमें मेरे क्लास के बच्चों को कोई पिटाई लगाता तो जाने क्यों उस टीचर से पिटाई का कारण पूछने पहुँच जाती।
उस दिन सवेरे class attendance के समय देखा था कि एक बच्चा लगातार क्लास में 7-8 दिनों से absent था। उन दिनों बच्चे तांगे में भी आया करते थे। एक बच्चे ने आकर बताया, मैडम वो घर से तो आता है लेकिन फूल बाग में उतर जाता है। फूलबाग हमारे स्कूल से लगभग 1/2 किलोमीटर दूर रहा होगा । बच्चे की बात सुन कर घबरा गई थी मैं ।। उन दिनों मेरे पास Tvs हुआ करती थी । बच्चे की चिंता में बिना Principal sir की permission लिए ही मैं फूलबाग पहुँच गई ।गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी कर फूल बाग में उसे ढूंढने लगी ।तभी एक पेड़ के नीचे बैठा वो बच्चा पढ़ रहा था । उसकी पीठ मेरी ओर थी ।मैं धीरे धीरे उसकी ओर बड़ रही थी । मुझे डर था कि कहीं फिर भागने ना लगे । उस बाग के किनारे ही बहुत चलती फिरती सड़क थी। ऐसे में दुर्घटना का डर था । मैं धीरे से उस से बोली, बेटा क्या बात है ? स्कूल में अच्छा नहीं लगता ? वो सुबक सुबक कर रोते हुए बोला maths समझ में नही आता । इसलिए मार पड़ती है। daily एक excercise home work मिलता है ।
मैने स्नेह से उसके सिर में हाथ रखा उसे अपने पास लाई बोला अब कोई तुम्हे नही मारेगा , अगर किसी ने मारा तो मैं पुलिस बुला लूँगी ।
उसने अपना बैग उठाया और मेरी स्कूटी के पीछे बैठ गया ।तब उस बच्चे को अपनी स्कूटी के पीछे बिठा मैं झांसी की रानी का सा एहसास कर रही थी।
स्कूल आते ही मैने उस अध्यापिका को जानकारी दी कि बच्चा maths में punishment के डर से फूल बाग में बैठ जाया करता है एवं छुट्टी में फिर तांगे में घर चला जाता है। आगे से ऐसा न हो ।
हमने बात को ज्यादा बढ़ाया नही ,नहीं तो बच्चे में बुरा असर होता। हर month की 10th को parents teacher मीट होती थी । अक्सर उस बच्चे की बड़ी बहन आया करती थी । वो KRG college की student थी ।उस दिन उसकी आँखों में आंसू थे । हम …बहनों का एक ही भाई है ,आपने बचा लिया उसे । तब लगा स्कूल की मैडम शब्द में भी माँ का सा दम तो होता है ।
बचपन कितना innocent होता है । जरा सी स्नेह में वह असीम ताकतवर सा हो जाता है और जरा सी भय में वो कितना सहम जाता है । daily home work बहुत से बच्चों को कितना डराता है । ✍️

खेल में रेलमपेल ।😀😀😀

राजनीति का खेल ।
देखो राजनीति का खेल।।

नेता के भाषण से,जनता
अंध भक्त बन जाती।
रूखी सूखी खाकर भी
नेता के गुण है गाती ।
हाय कितना महंगा हो गया
डीजल पेट्रोल तेल।

राजनीति का खेल ।
देखो राजनीति का खेल।।

क्या शिक्षा क्या स्वास्थ्य,
सभी हैं पीछे छूट जाते ।
थोड़ी सी विपदा में सारे,
अस्पताल भर जाते ।
इस भीड़ में फँस गए हम भी,
हो गई रेलम पेल।

राजनीति का खेल।
देखो राजनीति का खेल।।

हों जब पास चुनाव तो ,
नेता जनता द्वारे जाते।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे के
हैं ये भेद बताते।
इस झगड़े में देखो कितने
भर गए अपने जेल।

राजनीति का खेल।
देखा राजनीति का खेल।।

देश नहीं बिकने दूंगा कह
सारे बेचे जाते।
L. I. C. और रेलवे भी तो,
हाथ से निकले जाते।
दोस्त भाग गए धन उड़ा कर
बैंक हो गए फेल।

राजनीति का खेल देखो
राजनीति का खेल।।

किसी भी दल का नेता हो,
जनता ही चुन कर लाती ।
गर समझ होती नेता से
सारे काम कराती।
हवाई जहाज में घूमे मंत्री
जमीं पर ,
जनता रही है झेल ।

राजनीति का खेल।
देखो राजनीति का खेल।✍️

मन की ।🎈🎈🎈

मन तू मौन नहीं रहता है ।
कितना भी चाहूँ मैं,
तू अपनी ही कहता है ।
इधर उधर डोले है,
जो मन आये बोले है ।
औरों की भी, तो … सुन ।
तू क्यों नहीं सुनता है ?
मन तू मौन नहीं रहता हैं ?

कुछ ठान लिए बैठा है ।
कुछ मान लिए बैठा है ।
इतनी भी मनमानी कैसी ? जो…
इक तरफा तेरी धुन,
क्यों सबको तू धुनता है ?
गुण औरों के भी तो गा …
बस अपनी कही सुनता है ?
मन तू मौन नहीं रहता है ।
कितना भी चाहे
तू क्यों नहीं सुनता है ….
मन तू मौन नही रहता है …। ✍️

कक्का और बाँसुरी- धुन।🙏

आज कृष्ण जन्माष्टमी है । घर में जन्माष्टमी की खूब सजावट और भक्तिमय धूम रहती । रात को मेहंदी भी लगाई जाती । शायद यहां भी नाम का असर था , चक्रधर और राधा ,हमारी मां और पिताजी का नाम । 🙏लगता है घर के एक शांत व्यक्तिव का नाम भी , कृष्ण के नाम से जुड़ता है और वो थे हमारे लालू कक्का (सबसे छोटे चाचा ) । लालू कक्का ।ललित मोहन पांडे ।जब कभी ‘अहम’ भ्रमित करता है तो लालू कक्का की याद आती है । बिल्कुल सीधा साधा व्यक्तित्व । इतने सीधे कि विश्वास नही होता। हर समय मुस्कुराते रहना । भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय से संगीत प्शिक्षण लिया था लालू कक्का ने बांसुरी बजाने का शौक ऐसा कि जहां भी जाते उनकी साईकल के थैले में बाँसुरी अवश्य होती । हम नजरबाग में लालू कक्का के घर में आते ही कहते कक्का बांसुरी बजाइए लालू कक्का बांसुरी की धुन में मग्न हो जाया करते । हम भूल जाते कि कक्का निशातगंज से नजरबाग साईकल से आकर थकते भी होंगे ।अक्सर घर आते ही भाभी कहां हैं पूछते माँ के पैर छूते और जमीन में बिछी दरी में बैठ जाते ।कक्का की बांसुरी की आवाज न जाने क्यों जन्माष्टमी में सुनाई देती है । सोचती हूँ कृष्ण की बांसुरी का सम्बंध हमारे सीधे – सादे लालू कक्का की बांसुरी की धुन से अवश्य रहा होगा । न गीता के किसी उपदेश की आवश्यकता बस एक बाँसुरी और उसकी सम्मोहित करने वाली आवाज़। कितना कठिन कार्य है आदमी का सरल होना ।उन्हें शत शत नमन। 🙏

सभी की जन्माष्टमी की धुन और धूम की शुभकामनाएं एवं बधाई । 🎉🎉🎉✍️

चांद सा ।🌙

वो सबसे जुदा था ,
जो खुद पे फिदा था ।
खुदी में ही उसके
उसका खुदा था ।

स्वयं एक रौनक था,
ऋषि जैसे शौनक था।
वो करता मनमानी था,
मगर एक ज्ञानी था।

जहाँ भी वो जाता था,
मौसम ले आता था ।
गरम हवाओं में ,
बादल सा छाता था ।

वो जब भी गाता था,
मन को लुभाता था ।
रोता हुआ था जो,
उसको हँसाता था ।

उसकी वो कलाएं
थीं सब को लुभाए ।
मुसीबत में पहुंचे
जहां जो बुलाएं।

अमावस का दिन था,
वो कुछ अलविदा सा।
हुआ एक दिन गुम
वो इक बुदबुदा सा। ✍️

दीदी जीजा जी । 💔😪

वो खिलखिलाती
तो वो थे मुस्काते।
जरा भी नज़र थे
न उस से हटाते।
वो पल कैसे बीते
जो थे इतने मीठे।
वो उसके दीवाने थे,
थी वो भी दीवानी।
सच मानो सच्ची थी
उसकी कहानी।
जब से गई दूर
उसकी वो छाया
वो भी है गुम सुम
है कंकाल काया ।
पल भर की छाया
जीवन की माया ।
ये लम्हे जो देखे,
मुझे याद आया…
मुझे याद आया….। ✍️