वो क्यों हारी । 😢

जो बेटी घर की चहल-पहल ।
थी कोमल जैसे एक कमल।

निर्मल मन घर से जो निकल,

थी रही टहल ।
छलके वो नयन, पल पल छल छल ।
गरल भरा वह कोलाहल ।
किसने जीवन में दिया दखल ?
वह दुर्बल मन हो गई विह्वल ।
जैसे ‘बूंद गिरे धरती के पटल’ ।

मरने के बाद वो क्यों मारी ?
बिन कारण ही वह क्यों हारी ?
ध्वनि विपक्ष की हुई प्रबल।
नेता बलशाली था घर से निकल ,
चिल्लाया फिर से उछल उछल,
आओ संग में मेरे गाओ-
“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।”✍️

आज बहुत रोया ये थैला।

आज बहुत रोया यह थैला ।
लटके लटके हो गया मैला ।
कबसे कार में नहीं हूँ बैठा
जबसे बॉस तुम्हारा ऐंठा।
ले जाते थे मुझे बाज़ार।
भरते मुझमें चीज हज़ार।
कभी न मैंने ना ना की
सारी ताकत से भर लीं।
सोचा पहला भोग तुम्हारा
मुझको ही मिल जाता था।
पल भर की बस इसी ख़ुशी में
कितना मैं खिल जाता था।
सोचो कितने महिनों से,
छुपा हूँ दरवाजे पीछे।
तुमने भी जब देखा मुझको
नजरें कर लीं अपनी नीचे।
देखो इन नीची नज़रों को
अब मैं भी देख न पाऊंगा
हुए निराश अगर तुम इतना,
मैं रोने लग जाऊंगा।✍️

बाती दीपक की।

कैसा है ये मेल,
समेटे अपने अंदर तेल।

जलाने पतली सी बाती को।शिक्षा देती उस स्वाति को ।

लक्ष्मण-रेखा में सिमटी सी,
जीवन ज्योति जलाती जाती।

धीमे धीमे मिटती जाती ।
अंधकार से लड़ती जाती ।

चर्च में कैंडल रूप बनाए।
प्रेयर में जैसे जुट जाए।

मन्दिर में ये रखी जाती ।
और मज़ारों में दिख जाती।

तेल जलाता जिस बाती को,
उस बिन पलभर रह नहीं पाती।

जब उसके बिन बुझ जाती है ,
कहते हैं सब ,
‘बुझा है दीपक’ ।…✍️

रंग बिरंगा बाग बगीचा।🇮🇳

रंग बिरंगा बाग बगीचा सबको था भाया।
कलियां थीं और खिले फूल थे,
भंवरा भी मंडराया।
वर्षों से थे माली इस सुंदर फुलवारी में।
स्वर्ग जमीं पर ले आने की
थे तैयारी में ।
देख खिले फूलों को ,
दूजा भी खिल जाता था।
एक अगर मुरझाया तो,
दूजा मुरझाता था।
फूलों का सौंदर्य देख
लोग वहां आते थे।
रंग बिरंगी तितली चिड़िया
आनंद दे जाते थे।
पर इक दिन बदले माली,
छटनी की थी ठानी।
इसको काटा उसको छांटा,
थे करते मनमानी।
धीरे धीरे मौसम बदला,
फूल लगे मुरझाने।
माली नए थे नए तरीके
से लगे सुलझाने।
उस जमीं को बेच धनी को
माली मुस्काए।
जेब भरीं थीं दोनो की
रहते थे इतराए।
यादों में वो बाग हमारे
अब भी आता है।
अलग अलग फूलों की
रंगत याद दिलाता है।
संभलो जब तक,
साथ खिलें हम,
आनंद तब तक आएगा।
वरना एक और बाग़ भी,
धीरे से बिक जाएगा।✍️

ना सीता ना..ना।😪

मत बनाओ सीता बेटी को
अग्नि परीक्षा कब तक देगी ?
कब तक दुख भुगतेगी ?
राम तो राज्य करेंगे फिर से,
वो धरती रुख करेगी ?
ना ना ना ना….
उसको भी पतलून पहन कर
सैनिक एक बनाओ ।
चारों ओर घिरे जो रावण
मनमानी करते हैं।
उनको अग्नि देनी हो गर तो
ज्वाला इसे थमाओ।✍️

दुलहिन सा वृक्ष।💖🎺

एक पेड़ क्रेन से आया ।

जड़ में बहुत सी मिट्टी लाया ।

क्रेन की धुन सुन माली आया।

पेड़ देख वो था मुस्काया।

अपने बाग़ में जगह बना कर,

उसे सहेजा और लगाया ।

उसकी महक सभी को भाए।

जैसे इक सुंदर सी दुलहिन घर में आए

और घर के मंदिर में ,

पहला दिया जलाए। 💞📯….✍️

नन्दू सच बोला।👍🤗

नन्दू नन्दू
हाँ दादी ।
खाया लड्डू ?
हाँ दादी ।
सच तो बोला ?
हाँ दादी।
इतना भोला ?
हाँ दादी।
आजा राजा ।
हाँ दादी ।
गोदी आजा।
हाँ दादी।✍️

“आत्मीय-संवाद “🤔

नोट:यहां 24 शब्दों को उल्टा सीधा कर प्रयोग किया गया है।
मन-नम,मत-तम,नर-रन(रण),
राज- जरा,रामा-मारा,मरा-राम,
हार-रहा,दावा-वादा,बस-सब,
हक-कह,सहसा-साहस,
जगा-गाज,शव-वश,नींबू-बूनी,
रस-सर, दीन-नदी,जब-बज,
राधा-धारा,तन-नत,नाम -मना,
सच-चस, गर-रग,जीते-तेजी, रत-तर।😃 👇

मन को नम कर,
मत तम तू फैला ।

नर है तू रन ना कर।
राज जरा बता हमको,
रामा रट कर मारा उसको।
वो मरा राम के नाम पे जो,
वो कौन हारा ?
राम दुखी हैं,
मरा जो मानव,
किसने मारा ?

हार रहा है तू मानव ।
दावा जो किया ,
वादा तो निभा।
बस सब ,
हक से कह और
करके दिखा।
सहसा साहस
को जगा
गाज ना गिरा।
शव नहीं है तू
वश स्वयं को
कर ले तू।

जैसे नींबू- बूनीं
में रस सर
तक है भरा।
दीन असंख्य यहाँ।
नदी प्रेम की बहा ।
घुंघरू मन के
जब हैं बज ते ।
राधा- धारा
बहती मन पे।
मन नम
होकर गाए।
तन नत ,
हो जाए।
नाम अनेक
प्रभु के।
मना इनको
सभी के ।
सच का चस का,
गर रग में तेरे ,
जो समाए।
तू मन जीते
तेजी से
और प्रभु में
रत हो कर
तर जाए। ✍️