मैं खुद से खेलूं रे।💃👓🖼️

आँख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछूँ आ जाऊं ? फिर आजा बोलूं रे।
मन, मोबाइल, चश्मा मेरे बन गए साथी रे ।
इन अपने संगी साथी बिन, कैसे रहलूं रे ।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछूँ आ जाऊँ ? फिर आजा बोलूं रे ।
बोले चश्मा कहाँ छुपा मैं, ढूंढ ले मुझको रे ।
ढूँढू उसको इधर उधर फिर पा लिया बोलूं रे।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछुं आ जाऊं? फिर आजा बोलूं रे।
मोबाइल भी चुप छुप देखो , मुझे सताए रे।
कहां छुपा हूँ ढूंढो मुझको, धुन में गाए रे ।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे ।
खुद से पूछुं आ जाऊँ ? फिर आजा बोलूं रे ।
इधर भी देखूं उधर भी देखूं, किधर है बोलूं रे।
तकिया – नीचे पा जाऊं फिर, पा गया बोलूं रे।
आँख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूँ रे ।
खुद से पूछुं आ जाऊं ? फिर आजा बोलूं रे। ✍️

Published by (Mrs.)Tara Pant

बहुत भाग्यशाली थी जिस स्नेहिल परिवार में मेरा जन्म हुआ। education _B.Sc. M.A.M.ed.

9 thoughts on “मैं खुद से खेलूं रे।💃👓🖼️

  1. सजीव चित्रण किया है ।lock down में इनका साथ बहुत महत्व रखता है ।अति सुन्दर वर्णन किया है ।

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  2. जीवन भी तो एक खेल ही है जिसमें हम एक खिलाड़ी की तरह अपने अभ्यास और अनुभवों से सीख लेते हैं …और जो नहीं सीख पाता वो हार जाता है।

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  3. बेहतरीन लेखन।👌👌
    आँख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
    खुद से पूछूँ आ जाऊं ? फिर आजा बोलूं रे।

    Liked by 1 person

    1. एकाकीपन कभी कभी अपने बहुत पास ले आता है। पंक्तियां आपने सराही मुझे प्रेरणा मिली।🙏

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