एक विचार। A Thought🤔🌷

अपराध के बाद उस व्यक्ति में भय की भावना उत्पन्न होना, ईश्वर द्वारा दिया गया सबसे बड़ा दंड है।✍️

After committing a crime,the feeling of fear in that person, is the punishment given by the God.

Published by (Mrs.)Tara Pant

बहुत भाग्यशाली थी जिस स्नेहिल परिवार में मेरा जन्म हुआ। education _B.Sc. M.A.M.ed.

39 thoughts on “एक विचार। A Thought🤔🌷

  1. और जिसमें भय उत्पन्न ना हो उसे, इसका(भय) एहसास होने तक अपराध करना चाहिए?– क्या पता ये भी ईश्वर की कोई लीला हो ?

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    1. या अभी उसे आपके ईश्वर ही दण्डित ना करना चाह रहे हों उसे क़ानून कैसे दण्डित कर सकता है ??

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      1. ऊपर वाले ने मनुष्य को बुद्धि और विवेक दोनो दिए हैं इसीलिए मनुष्य ने अपने समाज के अनुसार कानून बनाया जिसमे ऊपर वाला दखल अंदाज़ी नही करता।

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      2. तो आपने ये निर्धारित किया कि क़ानून समाज के लिए बने हैं तो आप अप्रत्यक्ष रूप से ये कहना चाहती हैं कि अपराध की परिभाषा ईश्वर ने तय नहीं की ! तो आप ये कैसे कह सकती हैं कि जो कार्य करने से उसके अंदर भय उत्पन्न हो वो अपराध है? अर्थात अपराध को भी तो उसी इंसानो ने अपनी सहुलियत के अनुसार गढ़ा है ।।

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    2. पहला छोटे से छोटा अपराध करने में जो झिझक होती है वो हमें अपराध करने से रोकती है लेकिन फिर भी करें तो फिर आदत बनती है और ऐसे में अगर किसी की शह मिले तो अपराध के पथ पर बढ़ते है लेकिन एक भय के साथ हम अपने कर्मो को छुपते छुपाते है। वर्तमान में विकास दुबे इसका एक उदाहरण बना।

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      1. पर इससे ये तो नहीं कहा जा सकता ना कि अपराध को ईश्वर ने परिभाषित किया है? तो हमारा फ़िर वही प्रश्न कि आप “अपराध का निर्धारण कैसे करेंगी?” जबकि आपने ऊपर स्पष्ट किया है कि ये सब समाज अपने अनुसार बनाता बिगाड़ता है जिसमें ईश्वर अपनी कोई सहभागिता नहीं रखते ।।

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      2. और ये भी नहीं है कि केवल अपराध करने के बाद ही भय लगना ईश्वर का दण्ड होता है कुछ स्थिती में अच्छे कार्य करने के बाद भी भय होता है तो, क्या इसे भी ईश्वर का दण्ड माना जाना चाहिए??

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      3. भय के रूप अलग अलग हैं।रामायण में तुलसी कहते हैं भय बिन होए ना प्रीति कोई अपना बीमार हुआ तो भी कभी डर जाते हैं लेकिन ये भय का रूप क्या वही होता है जो एक अपराध के बाद होता है।वर्तमान में विकास दुबे इसका उदाहरण है।

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      4. विकास दुबे ही एकमात्र उदाहरण नहीं है जिनसे राजनीतिक लाभ लिया गया और जब वो ख़तरा बना गया तो उसका एक उदाहरण पेश किया गया, ख़ैर इसमें जाना मतलब राजनीतिक बहस शुरू करना और अपनी वैचारिक बहस अधुरी छोड़ना ।। बहरहाल, मेरा प्रश्न अभी भी वही है कि आप अपराध का निर्धारण करते हैं, जिसमें ईश्वर की कोई सहभागिता नहीं रहती, फिर कैसे ईश्वर की भागीदारी और अपराध का निर्धारण,जो कि उन्होंने तय नहीं कर रखी है, मान लिया जाए??

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      5. और ये रामायण और गीता के अलावा धरातलीय मिसाल पेश करेंगी तो समझना और आसान‌ होगा क्योंकि रामायण और महाभारत अभी भी प्रमाणित नहीं है, मतभेद जारी है ।।

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      6. नितेश तुम पड़ौसी के घर का कुछ सामान उस से छुपा कर लाओ तो अनुभव कैसा होगा क्या ये डर की समानता घर में लगी अचानक आग या आए भूकंप से उत्तपन्न डर के समान ही होगी ? बैंक से लोन की चोरी करके इतने धनी लोग किस डर से भागे ? उदाहरण के लिए नितेश ,’छप्पड़ फाड़ के’ मूवी देखना।उस भय का एहसास होगा।

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      7. तो दीदू… क्या ये माना जाना चाहिए की वो सब ईश्वर के डर से भागे हैं? और क्या वो वास्तव में किसी से डर के ही भागे हैं?
        ये तो पता है कि डर के मायने अलग अलग होते हैं, परंतु कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने किस कार्य को अपराध की श्रेणी में रखा है, जो करने से उत्पन्न भय, ईश्वरीय दण्ड है ?

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      8. तुम्हारे नाम नितेश में ईश काभाव है।रामायण और महाभारत या कुरान या बाइबिल सबमें उस परम ईश का भाव है।इसे प्रमाणित करने की आवश्यकता नही है।

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      9. बात नाम की नहीं है, दीदू…हम पुस्तक की बात कर रहे थे।। ख़ैर ये बताईए कि “ईश्वर” से आप क्या समझतीं हैं?

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      10. ये पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगा रही है ऐसे ही अन्य ग्रह उपग्रह एक दूसरे की परिक्रमा कर रहे बड़े नियम से ये system चल रहा है विभिन्न मौसम दिन रात फूल पौधे सब ।बिना शक्ति के कोई कार्य नही हो सकता उस अज्ञात सर्व शक्ति को ईश्वर का नाम दिया जा सकता है।फिर अपनी अपनी बुद्धि अनुसार हमने उस सर्व शक्ति को अलग अलग नाम दिए लेकिन अपने अस्तित्व का कोई तो नितेश है ना । जो नीति बद्ध है।

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  2. सबसे पहली बात कि गर अपराधी, अपराध करने के बाद डर जाता तो वो दुबारा कोई अपराध नहीं करता । और दूसरी बात कि अगर आपका ईश्वर किसी अपराधी को दण्ड देता तो इतने अपराध ही नहीं होते ।

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  3. मनुष्य राक्षसी और देवत्व दोनो की प्रवर्ति रखता है लेकिन देवत्व से उसकी दूरी थोड़ी समीप है।इसलिए ईश्वर का एहसास कर वो norms में रहने की प्रवर्ति रखता है।

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    1. बिल्कुल तभी तो उस शक्ति को लोगों ने अपने अनुसार नाम और रूप दिया ,जाकी रही भावना जैसी प्रभु (सर्व शक्तिमान )मूरत देखी तिन तैसी।
      सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो….।

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    2. तुम्हें देखा नही कभी ।ब्लॉग में मिले लेकिन तुम्हारे द्वारा मुझे सम्बोधित करना स्नेह का भाव उत्तपन्न करता है ये भी एक आनंददायी gift है ।

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      1. बिलकुल देख पाएंगी, आपसे आएगे कभी मिलने । बहरहाल‌, ख़ुद से भी फुरसत में मिले अरसा हुआ, इसलिए तबियत से कभी आएंगे आपसे मिलने।।

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  4. Ye jo Covid aaya hua hai iska karan hum log ke collective misdeeds ka natija hai. Humne pruthvi ko bahut nuksaan pahuchaya hai. Koi puchne wala bhi nahi mila. Bina dar ke chale ja rahe they. 🌿🍀🌾

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