रंग बिरंगा बाग बगीचा।🇮🇳

रंग बिरंगा बाग बगीचा सबको था भाया।
कलियां थीं और खिले फूल थे,
भंवरा भी मंडराया।
वर्षों से थे माली इस सुंदर फुलवारी में।
स्वर्ग जमीं पर ले आने की
थे तैयारी में ।
देख खिले फूलों को ,
दूजा भी खिल जाता था।
एक अगर मुरझाया तो,
दूजा मुरझाता था।
फूलों का सौंदर्य देख
लोग वहां आते थे।
रंग बिरंगी तितली चिड़िया
आनंद दे जाते थे।
पर इक दिन बदले माली,
छटनी की थी ठानी।
इसको काटा उसको छांटा,
थे करते मनमानी।
धीरे धीरे मौसम बदला,
फूल लगे मुरझाने।
माली नए थे नए तरीके
से लगे सुलझाने।
उस जमीं को बेच धनी को
माली मुस्काए।
जेब भरीं थीं दोनो की
रहते थे इतराए।
यादों में वो बाग हमारे
अब भी आता है।
अलग अलग फूलों की
रंगत याद दिलाता है।
संभलो जब तक,
साथ खिलें हम,
आनंद तब तक आएगा।
वरना एक और बाग़ भी,
धीरे से बिक जाएगा।✍️

Published by (Mrs.)Tara Pant

बहुत भाग्यशाली थी जिस स्नेहिल परिवार में मेरा जन्म हुआ। education _B.Sc. M.A.M.ed.

35 thoughts on “रंग बिरंगा बाग बगीचा।🇮🇳

  1. reality in this poem.बहुत सुन्दर शब्दो में उकेरा है भावों को ।अति सुन्दर ।

    Liked by 3 people

  2. गीतात्मकता है कविता में ….एकदम नैसर्गिक

    सुंदर लेखन…मन भा गई ❤🌼

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