चश्मा ।💖

जबसे है मेरा , चश्मा टूटा ,
हर शब्द ये मुझसे, है रूठा ।
कहता है ले अब तू ढूंढ मुझे,
आंखों पर जो इतना गर्व तुझे।
तूने शब्दों को कई बार ,
आंखों से ही बस जोड़ा है ।
आंखों का करके है बखान ,
चश्मे को क्यूँ कर छोड़ा है।

दो दिन वो जो तुझसे दूर हुआ ,
ओह तू कितना मजबूर हुआ ।
हम शब्दों को उसने ही तो ,
तेरी आँखों से जोड़ा है।

चश्मे की कमी न सह पाऊँ।
विरहा की पीड़ा बतलाऊं…
वह जबसे मुझसे जुदा हुआ ,
हर अक्षर काला भैंस हुआ ।

वो घर वापस जब आएगा,
मल- मल से उसे सहलाऊंगी ।
फिर प्यार से पहनूँगी उसको,
आभार मैं उसका जतला कर ,
शब्दों की जलधि में नहाऊंगी। ✍️

Published by (Mrs.)Tara Pant

बहुत भाग्यशाली थी जिस स्नेहिल परिवार में मेरा जन्म हुआ। education _B.Sc. M.A.M.ed.

16 thoughts on “चश्मा ।💖

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