उम्र- दराज़🎈

जैसे जैसे उम्र है निकली
रिश्ते बिखर गए।
जैसे जैसे उम्र बड़ी तो
वो भी निखर गए ।
झूठे सपने पाल रहे थे।
जो अब उनको
साल रहे थे।
सपने और उनके अपने भी
जाने किधर गए….
जैसे जैसे उम्र है निकली
रिश्ते बिखर गए।

विधि के विधान का लेख
है अपना,
“आज रहे जो
“कल हो सपना”
पल भर के अपने सपने
निंद्रा में इधर रहे।
नींद खुली तो तन्द्रा में ,
वो भी बिफर गए।
जैसे जैसे उम्र है निकली
रिश्ते बिखर गए।

हँस कर बोला तब एकांत,
“आ बैठ पास होकर के शांत।
मड़ा बहुत जीवन को तूने,

पल अब आया है निशांत। “

सपने में ही जीवन के
सारे दिन गुजर गए।
जैसे जैसे उम्र है निकली…..✍️

Published by (Mrs.)Tara Pant

बहुत भाग्यशाली थी जिस स्नेहिल परिवार में मेरा जन्म हुआ। education _B.Sc. M.A.M.ed.

2 thoughts on “उम्र- दराज़🎈

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