खिचड़ी। “khichdi”

खिचड़ी मेरी ज़िंदगी,खिचड़ी मेरी जान।जीभ बिगड़ जाए आपकी,न खाना कुछ श्रीमान।न खाना कुछ श्रीमान,तुम खिचड़ी खाना सीखो।मेरे जैसा जीवनतुम अपनाना सीखो।चार कटोरे चावल हों तो,तुवर लेना एक ही मुट्ठी।दस मिनट में बन जाएगी,होगी बर्तन की भी छुट्टी।जो परोसे खिचड़ी उसकोसूत्रबतादो देकर प्यार। खिचड़ी के हैं चार यार,पापड़ ,मूली, घी, अचार।स्वाद से फिर तुम खिचड़ी सबContinue reading “खिचड़ी। “khichdi””

भारत दर्शन।🇮🇳

मन के मंदिर में थोड़ा ठहर,मन के बाहर तो भव्य महल। मन- मंदिर में दीपक सा है तू ,भव्य महल में तो चहल पहल। हनुमान के सीने में , राम -सिया,फिर तू क्यों डोले पागल-पिया? थोड़ा तू ठहर जीवन की पहर ,सन्ध्या में बदलने वाली है। फिर राम अली दिखते संग संग,रमजान हो या ,दीपावलीContinue reading “भारत दर्शन।🇮🇳”

यादें (Memories.)

बहुत दिनों के बाद ये बेटी,संग मेरे आ बैठी ।सहलाया उसको फिर मैंने,और उसको बहलाया ।फिर बहुत दिनों के बाद ,ये बेटी संग मेरे आ लेटी।मैंने पूछा” कहाँ गई तू ?”बोली “क्या बतलाऊँ ।जैसे तू ढूँढे है मुझको ,मैं तेरा पता लगाऊं।”यह सुन कर बोली मैं उससे,“बेटी दुनिया एक पहेली ।पर जब भी मैं रहूँContinue reading “यादें (Memories.)”

आओ मिलकर झूमें ।🎻

आज नहाया वर्षा में जब ,पौधे मुझसे बोले,आजा तू भी बाहर आजा,अपना भी मुँह धोले।बहुत दिनों से अंदर बैठी,बाहर का सुख लेले।जैसे ही बाहर को झांका,झूम रहे थे पौधे ।मैं भी उन संग लगी झूमने,मास्क गिरा था औंधे।शीतल पवन ने फिर से ,अपना मृदु संगीत सुनाया,हम दोनों ने मिलकर, उसके ,तालों को दोहराया ।ताता- धिंन्नाContinue reading “आओ मिलकर झूमें ।🎻”

कवि की कविता हूँ।

हाँ मैं कवि की इक कविता हूँ।कवि के भावों की सरिता हूँ। गंगा सी बहती जाती हूँ ।जब लोग करें स्नान यहाँ,मैं पवित्र हो जाती हूँ।अपने कवि की मैं सविता हूँ। हाँ मैं कवि की इक कविता हूँ।कवि के भावों की सरिता हूँ। कभी रुदन करूँ कभी मुस्काऊँ।कभी मोहपाश में बंधजाऊं ।कभी कथा बनी कभीContinue reading “कवि की कविता हूँ।”

अमरलता। (dodder plant)

नारी तन की कोमलछुई मुई सी।कुछ शरमाईकुछ इठलाईवृक्षो में लिपटी,पुष्पलता । कुछ अति निर्बलचाहत है प्रबलमिलते ही सहारावृक्षों का,चढ़ती यूँ जैसे ,अमर लता ।✍️ नोट:दो प्रकार की लताएं एक– केवल सहारा लेती हैं।दूसरी – सहारे के साथ वृक्ष का भोजन भी शोषित कर लेतीं हैं।(dodder)

रिश्ते दार 🎩

तुमने मुझसे पूछा आजक्या होता है रिश्ता ?किसको कहते रिश्तेदार ?दिल से दिल की बात हुई जब,तब रिश्ते बन जाते हैं।इन रिश्तों को तोड़ें जोवो रिश्तेदार कहलाते हैं। *(यहां कविता में रक्त सम्बन्धी रिश्ते के बारे में चर्चा नहीं है।यहां समाज में रिश्तों की दारी(रौब) जो दिखाते हैं । )

दादी का गीत ।🎼🎵🎶

मोबाइल चुपके चुराय गयो रे।मैया मेरो कंनहिया ।दिल में बस्ती बसाए गयो रे।मैया मेरो कंनहिया।झटपट मोरी दवाई निकारे ।डॉक्टर बनिके अखियन में डारे।ओ मैया,“चश्मा”! देखो. छिपाय गयो रे।मैया मेरो कंनहिया।दिल में बस्ती बसाए गयो रेमैंया मेरो कंनहिया ।पुलिस वालो बनिके ये आवै।दरोगा सा मोपे रौब दिखावे।ओ मैयाडंडा मोपै ही चलाय गयो रे ।मैया मेरो कन्हइया।दिलContinue reading “दादी का गीत ।🎼🎵🎶”