प्रेम भाव ।💕🔔

भाव तुम्हारे पाकर पहुंची
इस दुनिया के पार।
जहां तुम्हारी गरिमा थी
और आनंद था अपार।
ये छोटे छोटे से सुख,
सच में क्या कर जाते
दुनिया के सारे दुख मानो
छू मंतर ही जाते ।
इन भावों में सच मानो तुम
ईश्वर का सुख पाती हूँ।
मन्दिर के घण्टों की गूंज में,
नतमस्तक हो जाती हूँ।✍️

आज रजाईं है मुस्काई।☺️

आज रजाईं है मुस्काई।
बहुत दिनो से बंद बॉक्स में,
मैं थी और मेरी तन्हाई ।
रेशमी कम्बल सबको भाए,
वो ही पहले बाहर आए ।
एक अकेली सिमटी सी मैं,
बॉक्स में ले मन को मुरझाए ।

चर्चा हुई थी कल इस घर में,
कैसे ठंड में भीगा वो भाई।
झुग्गी में रहता जो बोला,
सुन सभी का मन था डोला।
मुझे बॉक्स से बाहर निकाला
और जाकर उसको दे डाला।
लगा आज अपने घर आई।
संग मेरा पाकर वो है खुश,
उसके संग मैं भी मुस्काई।✍️

आंदोलन।⛏️🚜

○न जाने कुछ वर्षों से है,

कौन सा ग्रह यह आया ।
हिन्दू मुस्लिम करके उसने,
जनता को भरमाया।
कुछ अपनी ही कंपनियों का, पड़ा है उस पर साया।
देश को ना बिकने दूंगा,
था नारा एक लगाता ,
पर एक एक करके था ,
सब कुछ बिकता जाता।
अबकी बार गले की फाँस
बन गए अन्न दाता ।⛏️
जिनको अब तो ना उगला
और ना ही निगला जाता ।
जय जवान और जय किसान का जोश था फिर सेआया ।
वो ग्रह अबकी बार दिखा है
थोड़ा सा घबराया ।
कुछ वर्षों से पिला रहा है,
हिन्दू मुस्लिम हाला ।
जलियां वाले बाग़ के लोगों से
अब पड़ा है पाला।
हर पंजाबी भगत सिंह , पंजाबन शेरा-वाली,
पूरी जनता भी संग में है
हरियाणी-बंगाली।
पंजाब ने समझाई है,
संविधान की सतह।
वाह वाह गुरु दा खालसा
वाह वाह गुरु दी फतेह।✍️

वो क्यों हारी । 😢

जो बेटी घर की चहल-पहल ।
थी कोमल जैसे एक कमल।

निर्मल मन घर से जो निकल,

थी रही टहल ।
छलके वो नयन, पल पल छल छल ।
गरल भरा वह कोलाहल ।
किसने जीवन में दिया दखल ?
वह दुर्बल मन हो गई विह्वल ।
जैसे ‘बूंद गिरे धरती के पटल’ ।

मरने के बाद वो क्यों मारी ?
बिन कारण ही वह क्यों हारी ?
ध्वनि विपक्ष की हुई प्रबल।
नेता बलशाली था घर से निकल ,
चिल्लाया फिर से उछल उछल,
आओ संग में मेरे गाओ-
“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।”✍️

आज बहुत रोया ये थैला।

आज बहुत रोया यह थैला ।
लटके लटके हो गया मैला ।
कबसे कार में नहीं हूँ बैठा
जबसे बॉस तुम्हारा ऐंठा।
ले जाते थे मुझे बाज़ार।
भरते मुझमें चीज हज़ार।
कभी न मैंने ना ना की
सारी ताकत से भर लीं।
सोचा पहला भोग तुम्हारा
मुझको ही मिल जाता था।
पल भर की बस इसी ख़ुशी में
कितना मैं खिल जाता था।
सोचो कितने महिनों से,
छुपा हूँ दरवाजे पीछे।
तुमने भी जब देखा मुझको
नजरें कर लीं अपनी नीचे।
देखो इन नीची नज़रों को
अब मैं भी देख न पाऊंगा
हुए निराश अगर तुम इतना,
मैं रोने लग जाऊंगा।✍️

बाती दीपक की।

कैसा है ये मेल,
समेटे अपने अंदर तेल।

जलाने पतली सी बाती को।शिक्षा देती उस स्वाति को ।

लक्ष्मण-रेखा में सिमटी सी,
जीवन ज्योति जलाती जाती।

धीमे धीमे मिटती जाती ।
अंधकार से लड़ती जाती ।

चर्च में कैंडल रूप बनाए।
प्रेयर में जैसे जुट जाए।

मन्दिर में ये रखी जाती ।
और मज़ारों में दिख जाती।

तेल जलाता जिस बाती को,
उस बिन पलभर रह नहीं पाती।

जब उसके बिन बुझ जाती है ,
कहते हैं सब ,
‘बुझा है दीपक’ ।…✍️

रंग बिरंगा बाग बगीचा।🇮🇳

रंग बिरंगा बाग बगीचा सबको था भाया।
कलियां थीं और खिले फूल थे,
भंवरा भी मंडराया।
वर्षों से थे माली इस सुंदर फुलवारी में।
स्वर्ग जमीं पर ले आने की
थे तैयारी में ।
देख खिले फूलों को ,
दूजा भी खिल जाता था।
एक अगर मुरझाया तो,
दूजा मुरझाता था।
फूलों का सौंदर्य देख
लोग वहां आते थे।
रंग बिरंगी तितली चिड़िया
आनंद दे जाते थे।
पर इक दिन बदले माली,
छटनी की थी ठानी।
इसको काटा उसको छांटा,
थे करते मनमानी।
धीरे धीरे मौसम बदला,
फूल लगे मुरझाने।
माली नए थे नए तरीके
से लगे सुलझाने।
उस जमीं को बेच धनी को
माली मुस्काए।
जेब भरीं थीं दोनो की
रहते थे इतराए।
यादों में वो बाग हमारे
अब भी आता है।
अलग अलग फूलों की
रंगत याद दिलाता है।
संभलो जब तक,
साथ खिलें हम,
आनंद तब तक आएगा।
वरना एक और बाग़ भी,
धीरे से बिक जाएगा।✍️

ना सीता ना..ना।😪

मत बनाओ सीता बेटी को
अग्नि परीक्षा कब तक देगी ?
कब तक दुख भुगतेगी ?
राम तो राज्य करेंगे फिर से,
वो धरती रुख करेगी ?
ना ना ना ना….
उसको भी पतलून पहन कर
सैनिक एक बनाओ ।
चारों ओर घिरे जो रावण
मनमानी करते हैं।
उनको अग्नि देनी हो गर तो
ज्वाला इसे थमाओ।✍️