चांद सा ।🌙

वो सबसे जुदा था ,
जो खुद पे फिदा था ।
खुदी में ही उसके
उसका खुदा था ।

स्वयं एक रौनक था,
ऋषि जैसे शौनक था।
वो करता मनमानी था,
मगर एक ज्ञानी था।

जहाँ भी वो जाता था,
मौसम ले आता था ।
गरम हवाओं में ,
बादल सा छाता था ।

वो जब भी गाता था,
मन को लुभाता था ।
रोता हुआ था जो,
उसको हँसाता था ।

उसकी वो कलाएं
थीं सब को लुभाए ।
मुसीबत में पहुंचे
जहां जो बुलाएं।

अमावस का दिन था,
वो कुछ अलविदा सा।
हुआ एक दिन गुम
वो इक बुदबुदा सा। ✍️

दीदी जीजा जी । 💔😪

वो खिलखिलाती
तो वो थे मुस्काते।
जरा भी नज़र थे
न उस से हटाते।
वो पल कैसे बीते
जो थे इतने मीठे।
वो उसके दीवाने थे,
थी वो भी दीवानी।
सच मानो सच्ची थी
उसकी कहानी।
जब से गई दूर
उसकी वो छाया
वो भी है गुम सुम
है कंकाल काया ।
पल भर की छाया
जीवन की माया ।
ये लम्हे जो देखे,
मुझे याद आया…
मुझे याद आया….। ✍️

मिल जाओ ना सब ।🇮🇳💖🙏

चाहे बोलो ईश्वर अल्लाह
चाहे बोलो रब,
मानव-धर्म बड़ा है सबसे,
मिल नाओ ना सब।

मैं हिन्दू तू मुस्लिम कह कर,
कब तक बाँटे जाओगे ?
टूट टूट कर बच्चों को कल,
कौन सा पाठ पढ़ाओगे ?

इस मानव -धर्म में देखो
सबकी एक ही आशा
दुख -सुख हंसना- रोना सबकी,
देखो एक ही भाषा

ऊपर वाले को ही कहते,
ईश,अल्लाह और रब।
मानव धर्म बड़ा है सबसे,
मिल जाओ ना सब।

ऊपर वाले की भाषा को

तुम जानोगे कब ?

मानव धर्म बड़ा है सबसे
मिल जाओ ना सब

इक दूजे का दुख बांटो तो,
आधा हो जाता है।
सुख जब बांटो दूजे से तो,
दुगना हो जाता है।

अनुभव के इन भावों को

तुम पहचानोगे कब ?

मानव धर्म बड़ा है सबसे,
मिल जाओ न सब।

संविधान से शक्ति लेकर
प्रेम की डोर बनाओ।
इसी प्रेम की डोरी से
प्रगति-पतंग उड़ाओ।

आनन्द इस उड़ान का देखो,
मिल जाएगा तब।

मानव धर्म बड़ा है सबसे,
मिल जाओ ना सब ।


चाहे बोलो ईश्वर अल्लाह,
चाहे बोलो रब,
मानव- धर्म बड़ा है सबसे,
मिल जाओ ना सब । 🙏✍️


🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

चश्मा ।💖

जबसे है मेरा , चश्मा टूटा ,
हर शब्द ये मुझसे, है रूठा ।
कहता है ले अब तू ढूंढ मुझे,
आंखों पर जो इतना गर्व तुझे।
तूने शब्दों को कई बार ,
आंखों से ही बस जोड़ा है ।
आंखों का करके है बखान ,
चश्मे को क्यूँ कर छोड़ा है।

दो दिन वो जो तुझसे दूर हुआ ,
ओह तू कितना मजबूर हुआ ।
हम शब्दों को उसने ही तो ,
तेरी आँखों से जोड़ा है।

चश्मे की कमी न सह पाऊँ।
विरहा की पीड़ा बतलाऊं…
वह जबसे मुझसे जुदा हुआ ,
हर अक्षर काला भैंस हुआ ।

वो घर वापस जब आएगा,
मल- मल से उसे सहलाऊंगी ।
फिर प्यार से पहनूँगी उसको,
आभार मैं उसका जतला कर ,
शब्दों की जलधि में नहाऊंगी। ✍️

क्यूँ इतना छोटा कर डाला ।😪💝

हे ईश्वर क्यों है यहां भरम
सीमाओं में बांध तुझे,
क्यों इतना छोटा कर डाला।
विश्व व्याप्त तेरी शक्ति को
इसका -उसका कर डाला।

मेरी गीता के समक्ष,
उसकी कुरान झूठी लगती ।
उसके अल्लाह के आगे ,
भगवान भक्ति झूठी लगती।
मानव के इस झूठे प्रपंच ने,
मानव का कत्ल ही कर डाला।

हे ईश्वर भ्रमित हुए मानव ने,
तुझे कितना छोटा कर डाला।

इक गलियों में घूम घूम कर ,
जय श्री राम चिल्लाता है
और दूजा भी मस्ज़िद में चढ़ ,
अल्लाह अकबर को बुलाता है ।
जो सर्वशक्ति और सर्व व्याप्त,
उसका बंटवारा कर डाला ।

हे ईश्वर क्यों है यहां भरम
सीमाओं में बांध तुझे,
क्यों इतना छोटा कर डाला।
मानव के इस झूठे प्रपंच ने,
मानव का कत्ल ही कर डाला।

जो है सर्व शक्ति और सर्व व्याप्त ,
उसका बंटवारा कर डाला। ✍️

🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

आनंद ।🕉️🌈🎉🎈💖

जब साथ न दे ये तन,
घबराए मन,
ध्यान लगा उसका
और बैठ संग आनंद के ।

जब दिल टूटे,
कोई अपना छूटे,
अपने से ही
हो जाए अन-बन ।
तब मन में रमा उसको
और बैठ संग आनंद के।

जब यादों के बादल छाएँ,
बीते हुए क्षण से,
मिल ना पाएं।
तब यादों का संग्रह कर
और बैठ संग आनंद के।

जब घर के आँगन,
खुशियां आएं ।
नित दिन को ही सब ,
पर्व मनाएं।
तब पुण्यागिरी के दर्शन कर
और बैठ संग आनंद के।

आनंद में सेवा भाव भरा,
आनंद से ही तो सब हरा भरा।
अनगिनत आशीष संग लिए,
मंदिर में तू इक घण्टी बजा
और बैठ संग आनंद के।✍️

भाई का जन्मदिन ।🎉🎈🎈🎈

कोरोना जब हुआ था घर में
नानी याद आई थी।
तब भाइयों की ताकत ने मिल
ज्योति एक जलाई थी।
बीमारी का peak month था,
पर संग आशावान
सुदीप था।
अपनी बीमारी से उठ कर…
हॉस्पिटल की दौड़ लगाई।

सिंगापुर के फ़ोन ने भी तो
अपना असर दिखाया था…
60 था Oxygen level
98 ले आया था ।

अक्सर राखी की ये ताकत
अपना रंग दिखाती है,
इसीलिए हर आफत में…
भाइयों की याद आती है।

जन्मदिन है भाई तुम्हारा
कितना अनुपम दिन ये प्यारा।
हर पल आने वाली खुशियाँ
तुम जैसी ही निराली हों…..
आंगन में यूँ ही चहके चिड़ियां
घासों में हरियाली हो। ✍️

गमले में एक फूल ।💕


मेरे गमले में फूल खिला,
रंग हरा लाल पीला ‘मिला’।
कुदरत की ये कला
अद्भुत रूप दिखाती है ।
जितने पास रहो प्रकृति के,
आनंद उतना दे जाती है ।✍️

20 जुलाई💕

बिटिया मेरा दर्द मूक मैं किस से बोलूं रे।
सुनने वाले भी गए ऊब ,मैं किस से बोलूं रे।
बीते जाते हैं दिन जितने मैं उतना मरती हूँ।
जिसदिन हँसी मैं जितना बेटी, रात को रोती हूँ।
अपने रोने की बात ओ बिटिया, किस से बोलूं रे।
सुन ने वाले भी गए ऊब मैं किस से बोलूं रे ।
बेटी थी या तू देवी थी, था घर में माँ का वास मेरे।
देवी ने सहा क्यों इतना दुख, मेरे घर से जाने में।
मैं मन में रोलूँ रे …बिटिया मेरा दर्द मूक ……
दुनियां ये आना जाना है पर माँ का मन कब माना है।
जन्मदिवस में तेरे अब भी, राह निहारूं रे…..✍️

इतना तो बतला मुझे कोरोना।🤔

इतना प्यारा प्यारा रिश्ता, क्या इसी जन्म में मिलता होगा ।यहाँ रंगीले फूल खिले हैं , क्या वहां भी कोई खिलता होगा।

मन चाही बातें करते हम, सँग में हंसते , सँग रोते हम।
दुख सुख में सबका मिल जाना जीवन बनता एक तराना।
यहां ये प्यारे रिश्ते देखे ,क्या वहां भी कोई रिश्ता होगा…

धरती अम्बर सागर गहरा, कभी है शाम कभी सवेरा…
पेड़ों की हरियाली सुन्दर, है उन पर पंछी का बसेरा ….
प्रकृति का आनंद अनौखा यहाँ जो है क्या वहां भी होगा…

माँ का सर पर हाथ फेरना,अपनी उम्र का बड़ा सा हिस्सा पिता का बच्चों को दे देना।
नाना नानी दादा दादी चाचा चाची ननद और भाभी ,
हैं कितने प्यारे बंधन में।
‘श्रवण’ यहाँ अब भी घर घर में।
हर बच्चा है प्रभु का आशीष , हर बेटी देवी है यहाँ
भाई का बहनों से रिश्ता जो यहां पे है क्या वहाँ भी होगा….
मधुर मधुर यादों सँग जीवन यहां तो है क्या वहाँ भी होगा..
ले जा सँग तू मुझे कोरोना ,
पर इतना बतला दे मुझको ,
जो यहाँ पे है क्या वहां भी होगा…✍️