दादी के दोहे ,🤓

देखो मेरा मस्त कलंदर ,🎈
मूंछें लगा के बना सिकंदर।🎩
दौड़े सरपट बाहर अंदर,
जैसे राजा कोई धुरन्धर ।👑
मैं कहती हूँ आजा बन्दर,🐒
आजा कर लें, ‘सन्धि पुरंदर’ ।
तुझे खिलाऊँ मैं चुकन्दर,🍭
दोनो मिल फिर चलें जलंधर।
देखो मेरा मस्त कलंदर🎈
मूंछें लगा के बना सिकंदर।…✍️

भोगी राम।🙏

कभी कभी कोई व्यक्ति अपनी कर्तव्यनिष्ठा से इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वर्षों तक संपर्क टूट जाने पर भी वो अपने व्यक्तित्व की याद दिलाता रहता है ।
ऐसा ही एक व्यक्तित्व “चौकीदार भोगीराम” का तब सामने आ खड़ा होता है जब वर्षों बीत जाने के बाद वो आज भी अपनी उपस्थिति का अहसास कराता है ।
भोगीराम जिनकी ऊँची आवाज को किसी माइक की ज़रूरत नहीं थी । सफेद मूंछों एवं भारी भरकम कद काठी वाले भोगीराम का रुतवा ऐसा था कि विद्यालय के माननीय सचिव और प्रिंसिपल सर के समकक्ष उसे भी रखा जा सकता था। अगर आज भोगीराम के चेहरे का परिचय देना चाहूँ तो यही कहूँगी कि जब भी श्री मोहन भागवतजी को देखती हूँ तो भोगीराम की याद आ जाती है।
उनदिनों विद्यालय के चौकीदारों की कोई निश्चित यूनिफार्म नहीं थी पर भोगीरामजी अपने हल्के भूरे या सिलेटी सफारी सूट पोशाक में ही दिखाई देते । अपने साथ कुछ पक्षी पिंजड़े में लाते थे । शायद बटेर थे वो पक्षी ,जिन्हें विद्यालय के खेल मैदान के किनारे लगे पेड़ों की किसी एक शाखा पर टांग देते थे वो । इंटरवल में वो बटेर छोटे बच्चों का एक मनोरंजन होते थे।
कुछ बच्चों की आदत थी कि वे विद्यालय इंटरवल समाप्त होने के बाद ही पानी पीने नल के पास लाइन लगा लेते थे लेकिन भोगीरामजी के आते ही वे छूमंतर ही जाते ।
ग्यारहवी बारहवीं क्लास के जो छात्र विद्यालय समय में घर या कोचिंग जाने की जुगाड़ में रहते उनके लिए भोगीराम एक बड़ी बाधा थी जिसको पार करना आर्कमडीज के उस वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता के समान था जिसमें वो अपना प्रयोग सफल होते ही ‘ यूरेका ‘यूरेका’ चिल्लाया था।
मुझे याद है अपने रिटायरमेंट वाले दिन वो गले में फूलों की माला पहने छात्रों के सिर पर प्यार से हाथ रख रहे थे ।पहली बार भोगीराम जी को बच्चों से इतना घुलते मिलते देखा था ।
भोगीरामजी के सेवानिवर्ती के बाद ही विद्यालय की बाहरी दीवारें बहुत ऊंची कर दीं गईं थीं । सेकुरिटी भी बड़ा दी गई थी । विद्यालय के आंतरिक प्रवेशद्वार पर कोई दूसरा चौकीदारआ गया था फिर भी भोगीराम के जाने से एक सूनापन था । पेड़ की वो शाखा भी मौन थी जिसमें भोगीरामजी का पक्षी वाला पिंजड़ा लटका करता था । आज भी जब ‘ चौकीदार, शब्द सुनाई देता है तो अपने विद्यालय के गरिमामयी कर्तव्यनिष्ठ चौकीदार भोगीराम जी को प्रवेशद्वार में खड़ा पाती हूँ । 🙏 ✍️

पाठ अधूरा।

कितना भी परफेक्ट हो टीचर,
कुछ ही मिनट पढ़ाता है।
पीरियड ओवर होते ही,
फिर वापस वो हो जाता है ।
       ऐ मेरी ज़िंदगी बता तू ,
       कब तक मुझे पढ़ाएगी ?
       मेरे ही अनुभव से मुझको
       कब तक तू सिखलाएगी ।
माँ ने अंगुली थाम बरस में,
चलना मुझको सिख लाया,
और पिता भी कुछ महीनों में,
बोल मेरे होंठों तक लाया।
        पर कब तक तू, द्रोणाचार्य सी,
        एकलव्य को भरमाएगी?
        मांग तेरी पल पल में मेरे,
        अंगूठे तक हो जाएगी ।
अब तक तू जीवन का मेरे,
सार नहीं समझा पाई।
बस सुख दुख के इन जालों में,
तू मुझको उलझा ले आई ।
        अब तो स्याही खत्म कलम की,
        अब और न मैं लिख पाऊँगी।
         इस जीवन का पार कहां तक ,
         बिन जाने ही जाऊंगी ।
✍️

कोई दूर से आवाज दे ।😪

वो अक्सर महीने में दो बार आता saturday या sunday . एक साफ रंग वाला मोहिला सा युवक था वो कभाड़ी वाला । बिना ट्यूब टायर की उसकी साईकल की आवाज ही उसकी call bell थी ।
पैंट को अपनी पतली कमर में साधने के लिए नाड़े का उपयोग करता । belt नहीं रही होगी उसके पास । पहचान इतनी हो गई थी उस से कि वो बाहर का main gate खोल कर अंदर घर के कैंपस में स्वयं ही आ जाता ।
उस दिन उसके बारे में और भी जानकारी मिली थी जब घर के बरांडे में news papers तोलते तोलते वो जोर से चिल्लाया था “कभाड़ी वाला”। मैं हतप्रभ सी थी । घर में तोलते तोलते इतनी जोर से क्यों चिल्लाया था वो। हंसी भी आई थी उस पर । मैंने पूछा बहुत तल्लीन रहते हो अपने काम पर। शादी हो गई तुम्हारी ? वो हल्की सी आवाज में बोला ,’मैडम तीन बच्चे हैं मेरे । तीनों बेटियां हैं। उन्हीं के लिए ये काम करता हूँ। पहले सिमको फैक्ट्री में था। वो फैक्ट्री बन्द हो गई, फिर मूंगफली बेची ।उसमें कुछ नही मिलता था ।इसलिए ये काम शुरू किया था।’ मैंने कहा बहुत लगन है तुम में । एक दिन खूब पैसे वाले हो जाओगे। वो बोला ,’ अभी 28 साल की उम्र है मेरी ।आपकी दुआ रहे तो तीनों बेटियों को खूब पढ़ाऊंगा ।’
जुलाई का महीना था वो । घर में news papers बहुत इक्कट्ठा हो गए थे। उसने कहा था ,”किसी और को मत दिया करिए । मेरा तराजू चेक कर लो, मैं कभी भी गलत दाम नही लगाऊंगा।” उसी के नाम थे वो पेपर्स। सोचा था शायद गर्मी के कारण इतनी दूर ना निकला हो।
बड़ा suffocating दिन था वो । कॉलोनी कैंपस में आने वाले दूसरे कभाड़ी वाले ने बताया था, ‘वो संजू ? वो तो रहा नहीं। डेड़ दो महीने हो गया उसे गुजरे। उसे तो कुत्ते ने काट लिया था। पैसे की कमी से पूरे इंजेक्शन नहीं लगा पाया था वो । उसकी घरवाली अपने बच्चों के साथ गाँव चली गई थी ।’
न जाने क्यों वर्ष बीत गए उसकी मजबूरियों से भरी आवाज ‘कभाड़ी वाला’ आज भी कभी कभी दूर से सुनाई दे जाती है । 😪✍️

पंडित जी के जूते।

घर में दीदी का विवाह था। बड़ा उत्साह था विवाह में हम बच्चे उस समय बहुत उत्साहित थे । रात भर कन्यादान पूजा पाठ चलता रहा। कन्यादान के बाद सुबह कब हुई, पता ही नहीं चला । रात को सभी बहन भाइयों ने गुप्त meeting की थी। जीजाजी के जूते छुपाने की । कुछ बुद्धिमान भाई बहनों की duty लगा दी गई थी, इस काम में । अच्छी रकम मिलने की आशा थी क्यों कि हमारे नए जीजाजी आर्मी में captain थे । जूते ऐसी जगह छुपाए गए थे कि लाख कोशिशों के बाद भी कोई बाराती ढूंढ न पाता । घर के outer gate की hedges के बीच । हमने जूते छुपाई से मिलने की रकम बड़ी सुनियोजित तरीके से तय की थी ताकि सभी विवाह में उपस्थित 8-10 बहन भाइयों का हिस्सा बराबर हो सके। सवेरे 9 बजे बारात की विदाई थी। सब ओर शांति सी थी । अचानक पंडितजी की तेज आवाज बार बार सुनाई दी, अरे मेरे जूते कहां गए अरे मेरे जूते। लोग जूते ढूंढने लगे ।लोग पूछने लगे पंडितजी से, कहाँ उतारे थे जूते ? थोड़ी ही देर में जीजाजी भी सामने आ गए । ये क्या हो गया था दूल्हे जीजाजी ने तो जूते पहने हुए थे ।हमसे बड़ी भूल हो गई थी जिस कमरे में जीजाजी, पंडित जी और कुछ लोगों ने प्रवेश किया था।वहां सबसे नए जूतों को दूल्हे का समझ लिया था।
हम पंडित जी से क्या demand करते ।उन्हें चुपचाप से उनके जूते लाकर दे दिए थे । ✍️

मेरे अपने

इस दुनिया मे कितने आए,
कितने आकर चले गए।

कितने दिल मे बसे रहे,
कितनो को हम भूल गए ।

कितने फूलों की खुशबू से,
अब भी महका करते हैं।

कितने आंगन के पंछी बन,
अब भी चहका करते हैं।

जितने जलसे हुए खुशी में ,
बन आशीष ‘वो’ संग रहे।

यह जीवन होली सी रंगत ,
‘वो’ रंग की रंगत बने रहे।

जितने दिल मे आप बसे हो,
‘वो’ भी दिल मे बसे रहे।✍️
🌹💐❤️🙏

आज याद आ गयी

वैज्ञानिकों तुम्हारी जय हो तुमने पृथ्वी को प्रकाशित किया अपनी मेहनत और लगन से।आज अंधेरा करके दिया जलाकर आप की याद आ गई । आशा है फिर से आप कोरोना की medicine खोज निकाल कर इस तम को दूर करेंगे। 🙏

गुरु शिष्य दोनों खड़े किसके लागूं पांव ।

उस दिन वो शिक्षिका बच्चे का हाथ पकड़ क्रोधित हो बोली मैडम इसे अपने रूम में बिठा लीजिए । ये बहुत misbehave करता है । क्लास में आते ही ये हंसता है । मुझे देखते ही बच्चा sorry बोला। कई बार उस शिक्षिका द्वारा उस बच्चे के लिए ढीठ शब्द का उपयोग किया जाने लगा था ।
उस दिन तो मैं भी अकेले में रोई थी वो शिक्षिका कुछ दिनों बाद उस बच्चे को फिर ले आई थी। वो बच्चा बहुत डरा हुआ था । आंखों में आंसू और सिसकियां लिए। इस बार शिक्षिका से क्लास रूम वापस जाने को कहा और बच्चे को अपने पास बिठाया था मैंने । पूछा था बच्चे से,आज क्या किया बेटा, वो बोला वो मैडम बहुत अच्छी लगती हैं जब प्यार से बोलती हैं।आज मैंने उनकी साड़ी छुई थी ,मम्मी से भी अच्छी लग रहीं थीं।
❤️ 🙏
जीशान नाम के उस बच्चे को नहीं भूल पाती जिसके नए एडमिशन ने क्लास में तहलका मचा दिया था । वो LKG में नया नया आया था । “शिक्षक” के ओहदे से अपरिचित वो बच्चा किसी की भी बात नही सुनता और अपनी मनमानी करता । अक्सर उसकी क्लास शिक्षिका उसे दूसरे सेक्शन में बिठा देतीं थीं । जो मेरे कक्ष के ठीक सामने था। एक दिन बहुत गुस्से में मुझसे आकर बोला था,” आप हरदम यहीं बैठे फ़ोन करते रहते हो बच्चों को क्यों नही पढ़ाते सारी मैडम पढ़ाती हैं आप इधर उधर घूम कर आ जाते हो । मैंने sorry बोला था उसे। उसने गुस्से में hold your ears कहा तब मैंने कान भी पकड़े थे अपने । वो रॉब से it’s O.K. कह कर अपनी कमर में हाथ रख क्लास में लौट गया था । अगले दिन उसकी क्लास में after attendance 1st period में “May I come in” ? पूछ कर गई थी बच्चों से ।। दोस्ती की थी उन बच्चों से । जीशान बोला था आप अपनी चेयर हमारे क्लास में रख लीजिए।
💕🌻🙏🏼
उज्ज्वल तब LKG में था। alphabet का dictation दिया गया था । ‘A’ , ‘C’, ‘E’,’G’ , ‘M’ सभी letters सही लिखे थे लेकिन जहां आई ‘I’ बोला गया था वहां eye draw कर दी थी उस बच्चे ने ।
👁️🌷🙏
बात पुरानी हो गई वो बच्चा आज multinational company में उच्च पद पर है। उस दिन घर में स्कूल से उसका test paper आया था । Alphabet लिखने थे उसे । उस बच्चे ने अपने पेपर में उल्टी सीधी जगह बिना क्रम के लिखा था। टीचर ने उसे marks न देकर बड़ा सा question mark रख दिया था । उस sincere बच्चे की लापरवाही पर आश्चर्य प्रकट किया था। उस से प्यार से पूछने पर ज्ञात हुआ कि उसने A to Z पूरा लिखा था लेकिन टीचर ने क्लास में सबसे बोला था ,” ये टेस्ट है सबको बिना देखे लिखना है। मैंने आंखें बंद करके लिखा था। बिल्कुल नहीं देखा था।”
🤔💝🙏🏼✍️

भय की दौड़।

भव्य राम मंदिर बन ने का पहला चरण सम्पन्न हुआ। काश इन्हीं दूर तक चलने वालों में Make in india ढूंढा जाता। इन्हीं में से कई मिल्खा सिंह और पी.टी. उषा मिल जाते। लेकिन ये तो भूख और भय की दौड़ है। जो मैराथन से कई गुना अधिक दूरी तय करवाएगी । इस दौड़ का प्रारम्भ किसी whistle के बजने या झंडे से नहीं वरन बेरोजगारी भुखमरी और मौत के भय के alarm से हुआ है ।
नेता अपनी मीडिया-मार्केटिंग से बहुत प्रसन्न हैं। जनता नेता की जय जयकार कर रही है। T. V.
सरकारी हो गए हैं और जनता भी सरकारी।
वो जो दिहाड़ी मजदूर सपरिवार खदेड़ा गया वो इस काबिल नही था कि उसका कोरोना का टेस्ट हो पाता। आज जब चंदा मांगा गया है तब बड़ी वाह वाही और तालियां बज रहीं हैं परंतु उस दिहाड़ी मजदूर को ना उस समय कुछ मिला जब 3000 करोड़ एक मूर्ति पर व्यय किया और ना आज । हां मिला तो किसी अभिनेता को 25 करोड़ देने की बधाइयां , ‘like’ और ढेर सारे retweet । वो दिहाड़ी मजदूर और उसका परिवार आज भी उस अग्नि-पथ में अपने घर की तलाश में दौड़ रहा है थका हारा सा ।✍️