बाती दीपक की।

कैसा है ये मेल,
समेटे अपने अंदर तेल।

जलाने पतली सी बाती को।शिक्षा देती उस स्वाति को ।

लक्ष्मण-रेखा में सिमटी सी,
जीवन ज्योति जलाती जाती।

धीमे धीमे मिटती जाती ।
अंधकार से लड़ती जाती ।

चर्च में कैंडल रूप बनाए।
प्रेयर में जैसे जुट जाए।

मन्दिर में ये रखी जाती ।
और मज़ारों में दिख जाती।

तेल जलाता जिस बाती को,
उस बिन पलभर रह नहीं पाती।

जब उसके बिन बुझ जाती है ,
कहते हैं सब ,
‘बुझा है दीपक’ ।…✍️

रंग बिरंगा बाग बगीचा।🇮🇳

रंग बिरंगा बाग बगीचा सबको था भाया।
कलियां थीं और खिले फूल थे,
भंवरा भी मंडराया।
वर्षों से थे माली इस सुंदर फुलवारी में।
स्वर्ग जमीं पर ले आने की
थे तैयारी में ।
देख खिले फूलों को ,
दूजा भी खिल जाता था।
एक अगर मुरझाया तो,
दूजा मुरझाता था।
फूलों का सौंदर्य देख
लोग वहां आते थे।
रंग बिरंगी तितली चिड़िया
आनंद दे जाते थे।
पर इक दिन बदले माली,
छटनी की थी ठानी।
इसको काटा उसको छांटा,
थे करते मनमानी।
धीरे धीरे मौसम बदला,
फूल लगे मुरझाने।
माली नए थे नए तरीके
से लगे सुलझाने।
उस जमीं को बेच धनी को
माली मुस्काए।
जेब भरीं थीं दोनो की
रहते थे इतराए।
यादों में वो बाग हमारे
अब भी आता है।
अलग अलग फूलों की
रंगत याद दिलाता है।
संभलो जब तक,
साथ खिलें हम,
आनंद तब तक आएगा।
वरना एक और बाग़ भी,
धीरे से बिक जाएगा।✍️

ना सीता ना..ना।😪

मत बनाओ सीता बेटी को
अग्नि परीक्षा कब तक देगी ?
कब तक दुख भुगतेगी ?
राम तो राज्य करेंगे फिर से,
वो धरती रुख करेगी ?
ना ना ना ना….
उसको भी पतलून पहन कर
सैनिक एक बनाओ ।
चारों ओर घिरे जो रावण
मनमानी करते हैं।
उनको अग्नि देनी हो गर तो
ज्वाला इसे थमाओ।✍️

दुलहिन सा वृक्ष।💖🎺

एक पेड़ क्रेन से आया ।

जड़ में बहुत सी मिट्टी लाया ।

क्रेन की धुन सुन माली आया।

पेड़ देख वो था मुस्काया।

अपने बाग़ में जगह बना कर,

उसे सहेजा और लगाया ।

उसकी महक सभी को भाए।

जैसे इक सुंदर सी दुलहिन घर में आए

और घर के मंदिर में ,

पहला दिया जलाए। 💞📯….✍️

नन्दू सच बोला।👍🤗

नन्दू नन्दू
हाँ दादी ।
खाया लड्डू ?
हाँ दादी ।
सच तो बोला ?
हाँ दादी।
इतना भोला ?
हाँ दादी।
आजा राजा ।
हाँ दादी ।
गोदी आजा।
हाँ दादी।✍️

“आत्मीय-संवाद “🤔

नोट:यहां 24 शब्दों को उल्टा सीधा कर प्रयोग किया गया है।
मन-नम,मत-तम,नर-रन(रण),
राज- जरा,रामा-मारा,मरा-राम,
हार-रहा,दावा-वादा,बस-सब,
हक-कह,सहसा-साहस,
जगा-गाज,शव-वश,नींबू-बूनी,
रस-सर, दीन-नदी,जब-बज,
राधा-धारा,तन-नत,नाम -मना,
सच-चस, गर-रग,जीते-तेजी, रत-तर।😃 👇

मन को नम कर,
मत तम तू फैला ।

नर है तू रन ना कर।
राज जरा बता हमको,
रामा रट कर मारा उसको।
वो मरा राम के नाम पे जो,
वो कौन हारा ?
राम दुखी हैं,
मरा जो मानव,
किसने मारा ?

हार रहा है तू मानव ।
दावा जो किया ,
वादा तो निभा।
बस सब ,
हक से कह और
करके दिखा।
सहसा साहस
को जगा
गाज ना गिरा।
शव नहीं है तू
वश स्वयं को
कर ले तू।

जैसे नींबू- बूनीं
में रस सर
तक है भरा।
दीन असंख्य यहाँ।
नदी प्रेम की बहा ।
घुंघरू मन के
जब हैं बज ते ।
राधा- धारा
बहती मन पे।
मन नम
होकर गाए।
तन नत ,
हो जाए।
नाम अनेक
प्रभु के।
मना इनको
सभी के ।
सच का चस का,
गर रग में तेरे ,
जो समाए।
तू मन जीते
तेजी से
और प्रभु में
रत हो कर
तर जाए। ✍️

देखो बापू ।😪

बापू अपने देश में देखो
कैसी आंधी आई,
फिर से तुमको मारी गोली
और फिर बटीं मिठाई।

कुर्सी में आसीन हुए जो,
दया ना उनको आई।
बापू अपने देश में फिर से
कैसी आंधी आई…

देख हुआ है मन ये विचलित,
मन ही मन रोता है।
सत्य अहिंसा प्रेम-भाव,
सब विलुप्त होता है ।
बापू अपने देश में देखो
अद्भुत रीति ये आई।

फिर से तुमको मारी गोली
और फिर बटीं मिठाई।

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
प्यार भरा रिश्ता है।
इसी प्रेम-बंधन में ही तो
संविधान बसता है।
फिर से देश को बांट रही जो,
कोई प्रेतात्मा आई।

फिर से तुमको मारी गोली
फिर से बटीं मिठाई।

छोटी छोटी बातों में जो
ट्वीट किया करते हैं।
वो इन नफरत की बातों में
खामोश रहा करते हैं।
आज ना जाने क्यों फिर से

चरखे की याद है आई।

फिर से तुमको मारी गोली
फिर से बटीं मिठाई।

धर्म राज कह कर स्वयं को
देश को बांटे नेता।
जनता के अधिकार छीन कर
बना बड़ा विक्रेता।
द्वेष भाव देखा जबसे,
आंखें असंख्य भर आईं।

फिर से तुमको मारी गोली
फिर से बटीं मिठाई।

आज जन्मदिन है तुम्हारा,
शास्त्री जी भी आए।
चलो मिलें सब एक साथ
फिर नारा एक लगाएं।
जय जवान और जय किसान
से गगन भेद कर आएँ।
जनता का आपस में झगड़ा,
कितना है दुख दाई।

फिर से तुमको मारी गोली
और फिर बटीं मिठाई।
बापू अपने देश में देखो
कैसी आंधी आई।
फिर से तुमको मारी गोली
और फिर बटीं मिठाई। (2-10-20)✍️

हँस कर बोलो तुम भी । 😊

जो बीत गए हैं दिन
उनका क्या रोना…
आओ संग में बैठे
सुंदर है बिछौना।

जो बीत गई है बात
उनकी बातें क्यूँ…
दुखदाई उन घातों
की अब रातें क्यों…
हंस कर बोलो तुम भी ,
‘होगा वही जो होना…’

आओ संग में बैठे
सुंदर है बिछौना।

कभी दिया है प्यार
कभी ठुकराया है…
प्रभु ने दिया है वही
जो उसको भाया है।
सर को झुका के
नम्र भाव से तुम लेना…

आओ संग में बैठें
सुंदर है बिछौना ।

सुंदर सा है जाल
जो उसने बिछाया है…
इसी जाल में उसने
खेल खिलाया है…
जब तक भरी है चाबी,
तब तक चले खिलौना…

आओ संग में बैठें
सुंदर है बिछौना।

कभी धूप और कभी
छांव है जीवन में….
कहीं शहर और कहीं
गांव है जीवन में ।
गावों की हरियाली में
गर सुख पाओ…
शहरों की भी चकाचौंध
में रम जाओ…

अभी जो पाया है,
कभी तो खोना है…
हंस कर बोलो
‘हो जाए जो होना है।’

बीत गईं जो बातें
उनका क्या रोना…
जीवन है छोटा सा
इसको क्यों खोना..
हँस कर बोलो तुम भी ,
‘होगा वही जो होना।’

आओ संग में बैठे
सुंदर है बिछौना….
हँस कर बोलो तुम भी
‘होगा वही जो होना’। ✍️