छूटी तब आशा ।😪

सेवा भाव संग
कर्त्तव्य लिए,
रहता संग भय भी,
करता था, अतृप्त
अब छोड़ चला
हो गया हूँ तृप्त।
‘आशा’ की चिंता
सेवा में,
मैं मग्न रहा
होकर निर्विघ्न।
आशा ही तो
जीवन थी मेरा
पर आज मुझे तो
जाना है।
अब मृत्यु-शांति
संगिनी है मेरी
उसका भी साथ
निभाना है। ✍️

कुछ कुछ समझ न पाई।🤔🤗

इक बच्चे ने आकर
मुझको बातें हैं समझाईं।
मासूम है जीवन अपना
मगन रहो मेरे भाई।

कुछ तो समझ गई मैं पर,
कुछ कुछ समझ ना पाई।

एक तरुण ने आकर
मुझको बातें हैं समझाईं।
जितनी कर सकते हो मेहनत
कर लो मेरे भाई।
जीवन तो है इक जुगाड़,
तुम जोड़ लो जितना भाई।

कुछ तो समझ गई मैं पर,
कुछ कुछ समझ ना पाई।

इक वयस्क ने आकर
मुझको बातें हैं समझाईं।
जितनी चिंता कर सकते हो,
कर लो तुम मेरे भाई।
घड़ी जो निकली जाती है,
फिर लौट कभी न आई।

कुछ तो समझ गई मैं पर,
कुछ कुछ समझ ना पाई।

एक बुजुर्ग ने आकर
मुझको बातें हैं समझाईं।
दो पल के जीवन में अपने
थी समुंद्र गहराई ।
इक दिन आने का था बस,
इक दिन जाने का भाई।

थोड़ा थोड़ा समझी हूँ ,
जब पल में भूलूँ भाई । 🤔 ✍️


* * * * * * * * * * * * *

सिंघु बॉर्डर।🎉🇮🇳🙏🌱🌾⛏️🚜

मन हुआ नमन
उस राह में जाकर,
जहां बैठा था किसान,
जमीं लुटने से घबराकर।
अपने भारत के दर्शन,
हो जाते यहां पर आकर।
जैसे ईश्वर के दर्शन,
हो जाते मन्दिर जाकर ।
खुदा स्वयं मस्ज़िद से आए।
हर वाणी में गुरुद्वारा।
कितनी ताकत से बैठा है,
मेरा देश ये प्यारा।
कुछ उद्घघोष यहां से आते,
थे नारा एक लगाते।
जय जवान और
जय किसान सुन,
नेता थे डर जाते।
हर नेता व्यापारी था अब,
इनके गुरु गुजराती।
नंबर वन के व्यपारी सब,
नाचें ज्यूँ बाराती।
झूम रहे जो कुर्सी पाकर,
उनसे देखा ना जाता,
जब अन्न उपजाने वाला
खुलकर पीज़ा खाता।
नेता के कल्चर का पीज़ा
भी है ,खेत की माया ।
इनकी ही तो मेहनत से
खेत हरा लहराया।
सब धर्मों के बीच में
देखो कैसे खोदे खाई।
ये ना जाने संविधान का
नाता पक्का भाई।
आशीर्वाद सभी का
है किसान के मत्थे।
वाह गुरु दा खालसा
वाह गुरु दी फतेह। ✍️

In

अंतिम साँसे।😴

देखो दुनिया से जा रहा है वो।
खाली खाली साआया था ।
खाली खाली ही जा रहा है वो।
जिन साँसों ने साथ दिया
उन्हें ही छोड़े जा रहा है वो।
सांसे जो गिनती की शर्तों में
साथ देने आईं थीं,
उनकी ही विदाई किये
जा रहा है वो…
ओह… ✍️

प्रेम भाव ।💕🔔

भाव तुम्हारे पाकर पहुंची
इस दुनिया के पार।
जहां तुम्हारी गरिमा थी
और आनंद था अपार।
ये छोटे छोटे से सुख,
सच में क्या कर जाते
दुनिया के सारे दुख मानो
छू मंतर ही जाते ।
इन भावों में सच मानो तुम
ईश्वर का सुख पाती हूँ।
मन्दिर के घण्टों की गूंज में,
नतमस्तक हो जाती हूँ।✍️

आज रजाईं है मुस्काई।☺️

आज रजाईं है मुस्काई।
बहुत दिनो से बंद बॉक्स में,
मैं थी और मेरी तन्हाई ।
रेशमी कम्बल सबको भाए,
वो ही पहले बाहर आए ।
एक अकेली सिमटी सी मैं,
बॉक्स में ले मन को मुरझाए ।

चर्चा हुई थी कल इस घर में,
कैसे ठंड में भीगा वो भाई।
झुग्गी में रहता जो बोला,
सुन सभी का मन था डोला।
मुझे बॉक्स से बाहर निकाला
और जाकर उसको दे डाला।
लगा आज अपने घर आई।
संग मेरा पाकर वो है खुश,
उसके संग मैं भी मुस्काई।✍️

आंदोलन।⛏️🚜

○न जाने कुछ वर्षों से है,

कौन सा ग्रह यह आया ।
हिन्दू मुस्लिम करके उसने,
जनता को भरमाया।
कुछ अपनी ही कंपनियों का, पड़ा है उस पर साया।
देश को ना बिकने दूंगा,
था नारा एक लगाता ,
पर एक एक करके था ,
सब कुछ बिकता जाता।
अबकी बार गले की फाँस
बन गए अन्न दाता ।⛏️
जिनको अब तो ना उगला
और ना ही निगला जाता ।
जय जवान और जय किसान का जोश था फिर सेआया ।
वो ग्रह अबकी बार दिखा है
थोड़ा सा घबराया ।
कुछ वर्षों से पिला रहा है,
हिन्दू मुस्लिम हाला ।
जलियां वाले बाग़ के लोगों से
अब पड़ा है पाला।
हर पंजाबी भगत सिंह , पंजाबन शेरा-वाली,
पूरी जनता भी संग में है
हरियाणी-बंगाली।
पंजाब ने समझाई है,
संविधान की सतह।
वाह वाह गुरु दा खालसा
वाह वाह गुरु दी फतेह।✍️

वो क्यों हारी । 😢

जो बेटी घर की चहल-पहल ।
थी कोमल जैसे एक कमल।

निर्मल मन घर से जो निकल,

थी रही टहल ।
छलके वो नयन, पल पल छल छल ।
गरल भरा वह कोलाहल ।
किसने जीवन में दिया दखल ?
वह दुर्बल मन हो गई विह्वल ।
जैसे ‘बूंद गिरे धरती के पटल’ ।

मरने के बाद वो क्यों मारी ?
बिन कारण ही वह क्यों हारी ?
ध्वनि विपक्ष की हुई प्रबल।
नेता बलशाली था घर से निकल ,
चिल्लाया फिर से उछल उछल,
आओ संग में मेरे गाओ-
“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।”✍️