उसका रिस्पॉन्स

आज Women’s Day है । सिंगापुर से तनुजा का एक message आया है। तनुजा मेरे भैया की wife है । Dr. तनुजा । बार बार पढ़ रही हूँ । अच्छा लगा ऐसा लगा जैसे एक ऐसी सड़क है औरत जिसको वो अपने बच्चे के लिए बिल्कुल smooth रखना चाहती है।अपनी इस सड़क में परिवार के लोगों के चलने पर रास्ता दिखाती रहती है वो , लेकिन सड़क सी ठहरी हुई सी भी है वो । वो चलने वालों की चिंता भी करती है। अक्सर जीवन रूपी मैराथन की इस दौड़ में सड़क पर स्वयं पानी पिलाने वालों की कतार में भी खड़ी दिखती है वो। वो बात बात पर अपनी माँ को याद करती है पति में पिता का सा आदर्श ढूँढती है । भाई उसका अधिकतर सर्वोपरि होता है।
लेकिन होली में देवर और जीजा के साथ भी रहना चाहती है वो । भेज रही हूँ तनुजा का वो भावनात्मकपत्र महिला दिवस में शुभकामवाओं सहित 👇
I would dedicate Women’s day to my Mother. She was an achiever I believe as she raised four children with love and affection and tought the same ‘mantra ‘ to us .She became my role model in tenacity and inspired me to see the dreams and pursue them. Being religious by nature ,she tried her best to carry forward the culture and traditions of the family along with the responsibility of raising her four children. I being a daughter among three brothers , she raised me in a way to become independent avoiding various social norms at that time.She often quoted famous Tulsi Ramayana chants to me “ पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं “, जहाँ सुमति तहँ संपत्ति नाना “. And I feel abide by these quotes till date.
As parent now, I would like to learn from her how to give space to our children making them feel independent and to have blind faith that my child would always do right things . As that was enough for us not doing anything ‘out of line’.
Happy Women’s day ….

बहुत पास ले आई है वो अपने को इस महिला दिवस में……..✍️

शर्माजी

रोज की ही तरह उस दिन भी घर आते ही कार से उतर कर गेट खोल ही रही थी कि शर्माजी पास आने लगे ।सड़क के दूसरी ओर उनका मकान था। किसी से बातें करते कभी दिखाई नही दिए थे वो । पास की पड़ोसी ने एक बार उनका परिचय ये कह कर दिया था शर्माजी की पीने की आदत है।…उस दिन वो पास आ कर बोले पंत मैडम आपके जेठ मेरे ही आफिस में थे। फिर वे रामायण और महाभारत की बातें करने लगे थे । आधा गेट खोल कर मैं उनकी धार्मिक बातें सुन ‘जी’ ‘जी’ कर रही थी। तभी घर के पड़ोस की पिंकी ने आकर कहा ,आंटी आप अंदर जाओ इन अंकल ने आज चढ़ाई हुई है । मैने डर कर कहा शर्माजी मैं कार अंदर पार्क करके आती हूँ। फिर कार रखते ही घर के गेट का ताला खोल अंदर जाते ही दरवाजा बंद कर दिया था ।अपने कमरे की खिड़की के पर्दे के एक कोने से देखने लगी थी कि वो कब तक गेट में बाहर खड़े हैं ।थोड़ी ही देर में उनकी पत्नी आई और उनके कान में कुछ बोल उनका हाथ पकड़ कर उन्हें घर ले गईं थीं और अपने घर का दरवाजा बंद कर दिया था । …..शर्माजी की छोटी बेटी इंजीनियरिंग कर रही थी। वो अक्सर अपने घर के छोटे से बगीचे में अपनी चेयर में बैठी सामने टेबल में कुछ लिखती पढ़ती दिखाई देती। उसके पास ही बैठे शर्मा जी एक कुर्सी में अखबार पढ़ते दिखाई दे जाते थे। बीच बीच मे बेटी पापा को देखती और फिर अपनी पढ़ाई में मग्न हो जाती।………
उस दिन छुट्टी ली थी मैने भी । शर्मा जी की बेटी की विदाई थी । लड़का भी इंजीनियर ही मिला था ।विदाई के समय सारे पड़ौसी उनके घर के बाहर खड़े थे उस बेटी को विदाई देने । शर्माजी का विवाहित बेटा भी था जिसे उस दिन ही देखा था । थोड़ी ही देर में उनकी विवाह प्रथा अनुसार बहन को भाई अपनी गोद में लेकर दरवाजे से बाहर निकला ,वो कार की ओर बढ़ रहा था । शर्माजी की बिटिया के आंखों में आँसू थे पर मौन सी थी भाई की गोदी में वो पीछे मुड़ कर एक एक करके सबको देख रही थी । “अचानक अपने पापा को देख वो जोर जोर से रो कर चिल्लाई ,पापा नहीं… पापा नहीं .. पापा पीना नहीं मम्मी परेशान होंगी वो मर जाएंगी….पापा आप बीमार हो जाओगे… पापा आपको मेरी कसम पीना नहीं” । पूरा माहौल शांत था। सभी बेटी की विदाई के बाद आंखों में आँसू लिए अपने अपने घर को लौट गए थे।
बेटी के जाने के बाद मैंने देखा शर्मा जी बेटी की कुर्सी में बैठे अक्सर अखबार पढ़ते दिखाई देते थे। पिंकी ने बताया था आंटी बेटी की कसम के बाद अंकल ने पीना छोड़ दिया है।
उस दिन भी घर लौटते समय कार से उतरते ही जब घर का गेट खोल रही थी ,शर्माजी के घर की ओर नज़र पड़ी शर्माजी बेटी की उसी कुर्सी में बैठे थे जिसमें उनकी बेटी पढ़ते दिखाई देती थी । मेरे कदम अचानक उनकी ओर बढ़ने लगे । मैने हाथ जोड़ कर उन्हें नमस्कार किया। ये नमन उस पिता को था जो बेटी की दी गई कसम को तोड़ नही पाया । ये पापा अपनी बेटियों को कितना प्यार करते हैं ना ? ✍️

संवेदना

आज अपने ही शहर में मारकाट से आत्मा दुखी हुई। कितनों के हाथ पैर काट दिए गए ।बसी बसाई गृहस्थी कुछ ही क्षणों में आग लगा कर उजाड़ दी गई । कुछ खुश थे कुछ दुखी। उनकी खुशी और दुख बिल्कुल एक समान थे ।इस समानता के भाव में धर्म दूर दूर तक नही दिखा। दोनो के दर्द की आवाज का धर्म एक ही था ।लगता उनके डर ,दर्द, चिंता सब एक ही धर्म के हैं। यू ट्यूब में आकाशगंगा देखी थी ।तब स्वतः ब्रह्मांड से ब्रह्मा शब्द की याद आई । इसकी व्याख्या करते करते शायद अहम ब्रह्मा अस्मि से कुछ बुद्धिजीवी अपने को ब्राह्मण कहने लगे होंगे और फिर तुलनात्मक वर्गीकरण हुआ होगा। क्षत्रिय वैश्य क्षुद्र भी वर्गीकृत हुए । फिर कुछ ने अपने को धर्मों में बांटा होगा।तौर तरीके बदले । उस “शक्तिमान” की जगह अपनी अपनी बुद्धि अनुसार अलग अलग नाम और रूप दे दिए होंगे उस super natural power को । आज फिर एक अपने को बुद्धिजीवी मान कर कमजोरों को लड़वा रहा है।अपनी ऐशो आराम की लालसा में कमजोर बुद्धि वालों को भिड़ा रहा है। उसकी शातिर चाल से कुछ कमजोर मूर्ख अपने को पहलवान हिन्दू या पहलवान मुसलमान समझ गरीबों को मार रहें हैं।इन गरीबों का एक ही धर्म दिखाई देता है,और वो है गरीबी । इनकी विवशता और रोने का भाव बिल्कुल एक है। मैं फिर You tube से ब्रह्मांड देखने लगी । इस super पावर के सामने कुछ ने “जय श्री राम” और “अल्लाह” को शब्दों में सिमट कर छोटा कर दिया हैं और आपस में लोगों के बीच इतनी दूरी कर दी ।दुनिया के किसी भी कोने का मनुष्य हो उसके हंसने रोने सुख दर्द की भाषा तो बिल्कुल एक है ।लेकिन कमजोर बुद्धि के लोग कहां समझते हैं। वो आदमी के बनाए शब्द में उस सर्वशक्तिमान को भूल कर “जयश्रीराम” और “अल्लाह” चिल्लाकर विध्वंश कर रहे हैं।शातिर बहुत खुश है इन कमजोर बुद्धि के लोगों को देख कर क्यों कि शातिर का ऐशोआराम भविष्य जो सुरक्षित ही गया है इनके वोटों से।✍️

वो इंटरव्यू

वो 2004 का वर्ष था। मुझे विद्यालय की दूसरी विंग join करना थी । स्थानांतरण हुआ था । वर्तमान प्रधानाध्यापिका के रूम में बहुत भीड़ थी ।मैं बाहर लगी कुर्सियों मैं बैठी इंतज़ार करने लगी थी। याद आने लगा था । 20 वर्ष पूर्व इसी विंग में इसी corridoor में घंटो बैठी मैं interview के इंतज़ार में headmistress के रूम को देखती । न्यूज़पेपर में विद्यालय की टीचर्स requirement निकली थीं। घर मे आटा गूंध कर जल्दी जल्दी आई थी।
हाथों में नजर गई तो कुछ उंगलियों में आटा हाथ धुलने पर भी लगा रह गया था। मैंने वही चेयर में बैठे बैठे हाथ साफ किया था। फिर अचानक चौकीदार ने कहा बड़ी मैडम ने बुलाया है मैं उनके रूम में गई वे बोलीं । You are sitting there for a long time.What’s your problem? डरते हुए मैं बोली थी।Madam l was waiting for my interview. वे बोली यहां नहीं आप main school में जाइए। मैं घबरा कर टेम्पो से पहुंची थी ।ईश्वर के आशीर्वाद से मेरी नियुक्ति विद्यालय में हो गई थी।वो ग्वालियर का नामी विद्यालय था । अब 20 वर्ष बाद….. कल अचानक मुझे स्कूल सेक्रेट्री ने बुला कर इस विंग का पद भार संभालने को कहा था पर written कुछ नही दिया था । इन बीस वर्षों में इस विंग की हेड बदल गईं थीं । जैसे ही हेड मिस्ट्रेस के रूम से लोग गए मैने उन्हें बताया मैडम मेरा ट्रांसफर यहां हो गया है ।उन्होंने बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए कहा कहा आप साइंस टीचर हो न ? बैठिए आपको टाइम टेबल में adjust कर दूंगी स्टाफ रूम में बैठिए। कोई लेटर मेरे पास भी नही था । शायद उनके पास भी कोई इनफार्मेशन नही पहुंची थी। अचानक वे इंटरवल में स्वयं स्टाफ रूम आईं थीं 30 टीचर्स और मैं खड़े हो गए थे। वे बोली सॉरी मैडम आपने बताया नहीं आप मेरी जगह आई हो मुझे अभी अभी लेटर मिला है। वे अति सौम्य एवं गंभीर महिला थी । मेरा हाथ पकड़ वे अपनी चेयर तक ले गईं। मैने बैठने से मना किया था। वो मेरे से बहुत सीनियर थीं। वो भी चेयर में नही बैठीं थीं । स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन का यह निर्णय अत्यंत गोपनीय था। ना मैं जान पाई थी ना ही मैडम। दूसरे दिन सेक्रेटरी ने letter दे दिया था और कुछ targets देकर बोले अपनी चेयर में बैठिए और स्कूल की responsibilities संभालिए । दूसरे दिन लगा जैसे मैं विक्रमादित्य की seat में बैठी थी। सभी टीचर्स को information मिल गई थी वो wish कर रहीं थी लगा ये wish विक्रमादित्य की सीट को है जिसमे आज मैं बैठी हुई थी।✍️

स्वप्न

जिंदगी में किसी की भी नही हकदारी है…. फिर भी है एहसास…. जिंदगी में मेरे जो अपने हैं … उनकी भी तो जिम्मेवारी है । जिंदगी गर क्षण भर का सपना है, तो तकिया और चादर तो बनानी होगी …. एक सपने के लिए नींद भी तो अच्छी आनी होगी ।✍️

✍️ एक तम्मना

अभी तो झुर्री नही पड़ीं थीं, उम्र कहां थी जाने की। अभी तो ख्वाइश जीतने की थी,” हार”कहां पहनाने की। अभी तो जीना वर्षों का था, ” बिदा” कहाँ कह पाने की। अभी तो घर की रौनक थे तुम, अभी वहां से कहां गए। दिल की बाज़ी जीते थे तुम , किडनी से क्यों हार गए । ग्लानि बहुत है ,हमको भी तो, कुछ भी ना कर पाने की।पर बिटिया की एक तम्मना पापा को पा जाने की।✍️


	

समय

“दुख” पहाड़ के पत्थर सा है, सर पर गिरता है ,ज्यूँ संगमरमर की सीड़ी में पैर फिसलाता है। अपनों का अपनत्व रहे जब अपने आस पास ,दुख भी तन्हा नही रहा, वो हँस कर कहता है। जीवन झरना है भावों का बहता ही रहता है। इंद्रधनुष के रंग लिए धुन अपनी गाता है। कभी बना “बच्चन मधुशाला” कभी “अश्रु” नीरज का बन आँखों में रहता है। ✍️

मन मंदिर

मन के मंदिर में थोड़ा टहल,मन के बाहर तो भव्य महल। मन- मंदिर में दीपक सा है तू ,भव्य महल तो चहल पहल। हनुमान के सीने में , राम सिया, क्यों इत उत डोले पागल-पिया । थोड़ा तू ठहर जीवन की पहर सन्ध्या में बदलने वाली है…….। फिर राम अली दिखते संग संग, रमजान हो या ,दीपावली है ।मत बांट मनुज धर्मो में तू इतिहास करेगा थू थू थू । ये भारत पाक (पाकिस्तान) नहीं । क्यों रखता दिल को साफ नहीं ।योगी है तू मत बन भोगी ,बदले की कभी कहता जोगी ? भारत की शाख समझ भाई, माँ के अपने चार सिपाही, हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई।

👉थोड़ा तू ठहर जीवन की पहर,सन्ध्या में बदलने वाली है। फिर राम अली दिखते संग संग,रमजान हो या दिवाली हो।🛐🕉️

✍️

“मर्म उसका”

आदत सी बन गयी थी रात जब नींद नहीं आती तब मोबाइल में अपनो के बदले गए profile स्टेटस देखती । उनकी बेटी ने फिर अपनी प्रोफाइल में अपने पापा की तीन पिक्स डाल दी थीं और लिखा था पापा अगले जन्म में भी आप ही मेरे पापा होंगे। मैं उसके पापा की pics बार बार देखती। बड़ा ही आकर्षित व्यक्तित्व था।कुछ महीने पहले बद्रीनाथ से उनकी पत्नी का फ़ोन आया था बहनजी हम बद्रीनाथ पूजने आये हैं । पर्स में एक पर्ची मिली जिसमे आपका फ़ोन नंबर है।इसीलिए आपको फ़ोन लगाया है ।ये बात ग्वालियर छोड़ने के 9 साल बाद हुई थी। लो अपने भाईसाहब से बात करो वे बोलीं। ।हेलो कहने से पहले वे ठहाका लगा कर हंसे जो उनकी ओर आकर्षित करता वे यादव थे । बचपन में स्कूल जाने पर बेटी आरती उन्ही की देखभाल में रहती और आरती को हम आरती यादव के नाम से बुलाते। Mrs. Yadav एक घरलू महिला थी।पूरी तरह से Mr. Yadav की सेवा में भी तल्लीन। उनके कपड़े ऐसे सलीके से रखतीं जैसे हर रोज venish से धुले हों । घर मे ही iron करतीं। उनके पास बैठने पर चर्चा केवल यादव साहब की ही होती। पिछले महीने मैंने फ़ोन लगाया बोली तुम्हारे भाई साहब की तबियत ठीक नही है लो बात करो । फोन पर फिर उनके ठहाके की आवाज सुनाई दी । कुछ नहीं डॉक्टर ने किडनी की problem बताई है homeopathic इलाज शुरु किया है । उस दिन उन्हें तुरंत नोयडा आने को कहा था । किडनी मैं दूंगी बोली थी मैं । 11 जनवरी को पता चला वो पंचतत्व में विलीन हो गए……….. कल फिर फोन लगाया बेटी कह रही थी आंटी हमें आपका इंतजार था ।पापा मेरे सपने में अक्सर आते हैं। लीजिए मम्मी से बात कीजिये ,वहां से रोने की आवाज आई बोलीं पन्त मैडम मैने उनकी ज़िंदगी भर सेवा की साथ दिया लेकिन एक महीना हो गया बेटी के सपने में आए मेरे सपने में क्यों नही आए वो भारी आवाज़ और वो रुदन का मर्म दिल में भारी पन ला रहा था।मैं इधर चुप चाप आंसू बहाने लगी और उस उस मार्मिक शिकायत के मर्म का अहसास करती रही। 🙏✍️