भय की दौड़।

भव्य राम मंदिर बन ने का पहला चरण सम्पन्न हुआ। काश इन्हीं दूर तक चलने वालों में Make in india ढूंढा जाता। इन्हीं में से कई मिल्खा सिंह और पी.टी. उषा मिल जाते। लेकिन ये तो भूख और भय की दौड़ है। जो मैराथन से कई गुना अधिक दूरी तय करवाएगी । इस दौड़ का प्रारम्भ किसी whistle के बजने या झंडे से नहीं वरन बेरोजगारी भुखमरी और मौत के भय के alarm से हुआ है ।
नेता अपनी मीडिया-मार्केटिंग से बहुत प्रसन्न हैं। जनता नेता की जय जयकार कर रही है। T. V.
सरकारी हो गए हैं और जनता भी सरकारी।
वो जो दिहाड़ी मजदूर सपरिवार खदेड़ा गया वो इस काबिल नही था कि उसका कोरोना का टेस्ट हो पाता। आज जब चंदा मांगा गया है तब बड़ी वाह वाही और तालियां बज रहीं हैं परंतु उस दिहाड़ी मजदूर को ना उस समय कुछ मिला जब 3000 करोड़ एक मूर्ति पर व्यय किया और ना आज । हां मिला तो किसी अभिनेता को 25 करोड़ देने की बधाइयां , ‘like’ और ढेर सारे retweet । वो दिहाड़ी मजदूर और उसका परिवार आज भी उस अग्नि-पथ में अपने घर की तलाश में दौड़ रहा है थका हारा सा ।✍️

डर लगता है उस बच्चे से।😪

समय के इस दौर में आदमी भूल गया उस रचयिता को जिसने बड़े शौक से इस दुनिया की रचना की होगी ।विशेषकर भारतवर्ष की रचना करते समय उसका मूड बहुत अच्छा रहा होगा। एक बच्चे के innocent brain सा । जो अपनी ड्राइंग में सूरज, पहाड़, बादल, वर्षा, पेड़ -पौधे ,हरियाली , नदी ,नाव ,खेत सब अपने छोटे छोटे हाथों से बना देता है । शायद उस समय अपनी इस रचना को बना कर श्रद्धा से उसने ये पुष्प हम पर ही चढ़ाए हों जिन्हें आज हम उन्ही पर चढ़ाते हैंऔर इसी श्रद्धा से उस रचियता ने हमे बुद्धि क्षमता कुछ अधिक दे दी हो ।
दुख है हमने हरदम उस ईश्वर को अपने कब्जे में कैद करना चाहा उन चार दीवारी बिल्डिंग में जिसे कभी मन्दिर कभी मस्ज़िद ,गुरुद्वारा, चर्च के नाम से हम उसके मालिक बन बैठे।अपना मालिकाना हक इतना समझ लिया कि हम भष्मासुर बन आदमी को दूसरे समूह में रख मानव का ही नाश करने लगे । मानव गुरु का झांसा दे स्वयं की पूजा करवाने लगा ।वो एक ब्रोकर बन ईश्वर और पुजारी के बीच दीवार बना और ईश्वर के स्थान पर स्वयं बैठ गया । मानव स्वयं का बनाया धार्मिक चोला पहन अपने को दूसरे से अधिक विशिष्ट समझने लगा। ईश्वर ने इसके canine teeth reduce किए थे और इसमें दया भाव डाला था लेकिन आदमी स्वयं ही एक हानिकारक वायरस की तरह behave करने लगा था। तब लगता है ईश्वर ने भी अपने इस drawing पेज को एडिट कर मानव को रोकने के लिए कोरोना की एंट्री कर दी है । कभी कभी डर लगता है यदि ये मानव ईश्वर की इस रचना का तिरस्कार यूं ही करता रहा तो वो रचयिता कही अपने इस रचना के पन्ने को फाड़ कर फेंक ना दे ,उस innocent बच्चे की तरह जो कभी झुंझला कर अपनी ही ड्राइंग पेज को मोड़ तोड़ कर फाड़ कर फेंक देता है ।✍️

माँ 💝🙏

सच मानो माँ के जाने पर…..
माँ ही हरदम आती है ।
आंसू निकले जब आंखों से…..
वो रुमाल बन जाती है।
कभी वो आई “ईजा” बन कर ….
कभी ध्वनि बन, “ओ मेरी माँ ” ।
सभी छूटते धीरे धीरे ….
छूट ना पाये मेरी माँ । ✍️

बोन्साई

तुमने आकर मुझको काटा,
मुझमें ही कुछ मुझको छाँटा।
सीमाओं में बांध दिया,
इक छोटे से आँगन में ।
जैसे सागर तपता है,
सावन में जल देने को।
लो मैं भी तैयार खड़ा हूँ,
तुमको फल देने को । ✍️

अपनापन🌱

मैं हूँ और मेरा सूनापन,
कितना इसमें है अपनापन ।
कभी बनाया पंछी इसने,
कभी बनाया है आकाश।
दूर रहे तुम जितना मुझसे,
ये ले आया अपने पास ।
सुलझाया मेरा उलझा मन।🌷
कितना इसमें है अपनापन ।
मैं हूँ और मेरा सूनापन…
बहुत दूर थी मैं अपने से,
जब तक तेरे पास रही मैं।
आज हुई जब दूरी तुझसे,
इसे किया मैंने सब अर्पन।
महकाया मेरा मन आँगन।🌹
कितना इसमें है अपनापन।
में हूँ औऱ मेरा सूनापन .. ✍️

बंगला नंबर 10

22 quarters की उस छोटी सी कॉलोनी में कुछ दिनों पूर्व ही बंगला नंबर 10 मिसेस कुशवाह को अलॉट हुआ था। दो बेटियां और एक बेटे की माँ थीं वो ।अक्सर अपनी बड़ी बेटी को organic chemistry पढ़ाया करती थीं। कुछ इस तरह से कि उनकी आवाज से मुझे भी Organic compounds acids अल्कोहल के फॉर्मूले revise होने लगे थे।
कॉलोनी में आने के कुछ ही दिनों बाद उनके घर से अजीब तरह की क्रोध भरी आवाज आने लगी थी। वो मिस्टर कुशवाह की आवाजें थीं । कभी कभी अपने इस क्रोध में वे गन्दी गालियों का उच्चारण करते और पत्नी पर हाथ उठाने की आवाजें भी आतीं। ऐसे समय वो अपने बच्चों से दूसरे रूम में चले जाने की बात करतीं । सवेरे फिर सब सामान्य सा हो जाता था । दुबली पतली मिसेज कुशवाह एक सुंदर आकर्षित व्यक्तित्व की महिला थीं।
उस दिन sunday था । वे बाहर धूप में बैठी थीं। यूं ही बात करने के बहाने मैंने कहा ,मैडम आज धूप अच्छी है । वो मुस्कुराईं फिर वे अक्सर अपने कॉलेज से वापस आते समय मुझसे मिलने आ जातीं थीं। उनकी सहनशीलता को देख मैने पूछ ही लिया था ,” आपने क्या प्रेम विवाह किया था ?” वे बोलीं नहीं नहीं हम कुशवाह हैं ना मिसेज पंत ,हमारे यहाँ अधितर लड़के की खेती जमीन-जायदाद देखकर लड़की को देते हैं। ये पढ़े लिखे नही थे लेकिन जमीन खेती थी मेरे ससुर जी की । पीने खाने की आदत थी इन्हें । घर से लड़ लिए। मेरे पिता सरकारी शिक्षक थे इसीलिए हम बहनों की शिक्षा में कोई बाधा नहीं आई।। वे बोलीं M.Sc. B.ed. करते ही मेरी लेक्चरर posting हो गई थी। M.ed. करते ही शिक्षा महाविद्यालय में ट्रांसफर होने से मकान भी मिल गया। मेरे तीनो बच्चे पढ़ाई में बहुत बुद्धिमान हैं। मैनें पढ़ाई में इनके concept बिल्कुल clear रखे हैं। जाते जाते उन्होंने बड़े अपनेपन से कहा ,” बच्चे पढ़ लें फिर अपने पहनने खाने के शौक पूरे करूंगी। बिना सोचे समझे उनसे बोल बैठी थी मैं , मैडम अगर आप बुरा ना माने तो मेरे तीन brand new सूट्स हैं जरा नापिये । वे थोड़ी ही देर में सूट पहन दिखाने आ गईं थीं। अक्सर वही सलवार सूट पहने वो कॉलेज जाया करतीं थीं। मुझे पहली बार अपने कपड़े बहुत मूल्यवान से लगे थे।
मिसेस कुशवाह ने बताया था कि ” शाम को अक्सर कुशवाह साहब उनसे 100 -200 रुपये मांगते हैं बोतल के लिए कभी न देने पर वे अशांत हो जाते हैं। अब तो वे गालियां चिल्लाकर ऐसे देते हैं जैसे श्लोक का उच्चारण कर रहे हों। एक दर्द छुपा था उनकी इस बात में।
उस रात कॉलोनी के 4- 5 पड़ौसी हमें भी बुलाने आ गए थे । बोले 10 नंबर के इस आदमी को ठीक करना है । ये इतनी भद्दी गालियां दे रहा है कि इनकी गालियां हमारे घर तक पहुंच रही हैं। इसके घर में भी तो बच्चे हैं। शायद उस दिन वे अपने कमरे की खिड़कियां दरवाजे बन्द करना भूल गईं थीं इसीलिए आवाजें उन पड़ौसियों तक पहुंच गईं थीं। उनके call bell बजाने के थोड़ी देर बाद मिसेस कुशवाह घर से बाहर आईं थीं । सभी को नमस्कार किया । फिर उनमें से एक पड़ौसी बोले आप कुशवाह साहब को बाहर बुलाइए उन्हें समझाना है । वो आपको ऐसे कैसे मार सकते हैं और गालियां दे सकते हैं ? मिसेस कुशवाह बोलीं ,”ये मेरा आंतरिक मामला है। माफ कीजिएगा । वो सवेरे ठीक हो जाएंगे । भविष्य में आप लोगों को परेशानी नही होगी ।” उन्होंने अपने खिड़की दरवाजे बंद कर दिए थे ।
दूसरे दिन वो बहुत रुवांसी सी मेरे पास आई थीं बोलीं मैडम मुझे मकान छोड़ना ही होगा ये नही मानते । कल पड़ौसियों को भी कुछ कह बैठे तो बुरा होगा । बहुत डरती हूँ मैं ।
कुछ दिनों बाद वे स्वयं ही 10 नंबर बंगला छोड़ कर किसी मोहल्ले के छोटे से मकान में शिफ्ट हो गईं थीं ।
आज बंगला नंबर 10 सूना था । एक शांत सी पढ़ी लिखी महिला की पीड़ा बंगला नंबर 10 छोड़ कर किसी मोहल्ले के छोटे से मकान में शिफ्ट हो गई थी ।✍️

कुछ रिश्ते 💖

रिश्ते जो मन से होते हैं, तन से उनका क्या लेना।
मन ही मन में पलते हैं वो,चलता है लेना देना।
प्रभु को किसने कब देखा है ,
पर दर्शन हो जाते हैं।
मन मंदिर में जब वो आते,
नयन स्वयं झुक जाते हैं।
कुछ रिश्ते माँ की छाया से, उम्र का उनसे क्या लेना।
प्यार से जब बातें हों उनसे, लगता माँ का आ जाना।
भावों को किसने कब देखा ,
अश्रु जहाँ बह जाते हैं।
भाई सी छवि माँ सी बातें,
सब उसमें पा जाते हैं ।
कुछ रिश्ते जो जन्म से होते, दूरी का तब क्या लेना ।
सारी उम्र रहें वो दिल में , रहता है आना जाना। 💖💕✍️

�❤️💕

“आशिफ़ा”

आ बेटी आशिफ़ा आ …
गोदी में मेरी तू आ …
आँसू से नहलाऊंगी…
तुझको मैं सहलाऊंगी।
थोड़ा सा ले पानी पी…
थोड़ा सा ले खाना खा।
आ बेटी आशिफ़ा आ।
गोदी में मेरी आजा….
धर्म से फिर विश्वास उठा है….
बस दर्द तेरा अहसास हुआ है…
आ थोड़ा सा पानी पी….
संग में मेरे खाना खा।
आ बेटी आशिफ़ा आ।
आज निर्भया दिवस मनाया…
उसकी माँ संग जश्न मनाया….
आ तू भी संग मेरे आ .
आ बेटी आशिफ़ा आ ..
गोदी में मेरी आजा । ✍️

उस दिन

कुछ की आंखें थी नम होकर,
कुछ मुस्काए थे यह सुन कर।
कुछ थे नाम राम का लेते,
कुछ अल्लाह अकबर थे कहते।
कुछ ने हाथ लिए थे पत्थर,

कुछ निकले थे खंज़र लेकर।
इक दूजे को मरते देखा ।
खून एक सा बहते देखा ।
चीखें भी कितनी मिलती थीं ।
दर्द में ये दिल्ली घुलती थी।
नेता देश से बड़ा हुआ था ।
ज़िद में अपनी अड़ा हुआ था ।
एक इंच ना पीछे जाता था वो ।
पब्लिक को भड़काता था वो।
पर ‘दिल वाले’ दिल्ली के थे ।
कुछ ने जा उनको सहलाया।
कुछ ने जा के गले लगाया ।
नेता की चाल ना चल पाई थी ।
भारत का दिल , ‘दिल्ली अपनी’।
दिल वालों की कहलाई थी । 🇮🇳✍️