मैं खुद से खेलूं रे।💃👓🖼️

आँख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछूँ आ जाऊं ? फिर आजा बोलूं रे।
मन, मोबाइल, चश्मा मेरे बन गए साथी रे ।
इन अपने संगी साथी बिन, कैसे रहलूं रे ।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछूँ आ जाऊँ ? फिर आजा बोलूं रे ।
बोले चश्मा कहाँ छुपा मैं, ढूंढ ले मुझको रे ।
ढूँढू उसको इधर उधर फिर पा लिया बोलूं रे।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछुं आ जाऊं? फिर आजा बोलूं रे।
मोबाइल भी चुप छुप देखो , मुझे सताए रे।
कहां छुपा हूँ ढूंढो मुझको, धुन में गाए रे ।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे ।
खुद से पूछुं आ जाऊँ ? फिर आजा बोलूं रे ।
इधर भी देखूं उधर भी देखूं, किधर है बोलूं रे।
तकिया – नीचे पा जाऊं फिर, पा गया बोलूं रे।
आँख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूँ रे ।
खुद से पूछुं आ जाऊं ? फिर आजा बोलूं रे। ✍️

पल भर के रिश्ते💞

वैसे तो कई बार नैनीताल की ओर गई हूँ परंतु अक्सर रामपुर रोड काशीपुर बाजपुर के तिराहे से रास्ता confuse करता है। कार में उस दिन G.P.S. काम नही कर रहा था और हम हल्द्वानी न जाकर काशीपुर पहुंच गए थे। तब से कार रोक कर पास खड़े लोगों से रास्ता पूछ लेते हैं । कार का window glass नीचे करके हम पास खड़े लोगों को बुलाने का इशारा जैसे ही करते दो तीन लोग तेजी से आते ,हम पूछते ” भैया हल्द्वानी का रास्ता कौन सा है ? वे बड़ी आत्मीयता से समझाते “आप इस रास्ते से जाइए रामपुर road का रास्ता उबड़ खाबड़ है । आपको परेशानी होगी ।” दूसरा कहता बाजपुर के रास्ते की सड़क अच्छी है लेकिन रात को सुनसान हो जाती है वो सड़क ।रात के लिए उतनी सुरक्षित नही है ।” हम उनको धन्यवाद कहते हुए window glass नीचे कर आगे बढ़ जाते हैं ।
सोचती हूँ ये अक्सर होता है कहीं भी नई जगह या दूर जाने पर हम अनजाने लोगों से राह पूछते हैं और उनके बताए रास्तों में कितने विश्वास के साथ चल पड़ते हैं उस दिशा में और अपने गंतव्य को पा लेते हैं।
महसूस किए है मैंने ये रिश्ते भले ही क्षणिक हों एक तरफा निस्वार्थ से ये लोग । बहुत दूर तक अपनी ध्वनि बनाए रखते हैं ये। ये लोग ना हिन्दू लगते हैं ना मुसलमान बस बहुत अपनत्व समेटे हुए से हैं , ये पल भर के रिश्ते कितनी राहत देते हैं। 🙏 ✍️

माँ ने ऐसा feed किया,कुछ दूध में अपने घोल कर।

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माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर ।

सबकी चिंता रही उसे,

बस अपनी चिंता छोड़ कर

अक्सर बेटी त्याग- भाव में,

कितना कुछ कर जाए।

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो”,

इस पथ को अपनाए ।

सिद्दार्थ छोड़ घर से जब निकले,

गौतम बुद्ध बन आते ।

और यशोधरा चिंतित हो कहती ,

सखी वो मुझ से कह कर जाते ।

पुत्र की भिक्षा दे गौतम को,

खड़ी थी हाथ वो जोड़कर ।

माँ ने ऐसा feed किया ,

कुछ दूध में अपने घोल कर…..

राम की अर्धांगिनी बन सीता,

वन – वन साथ निभाए

आदर्श पुरुष बन गए राम,

पर सीता धरा समाए ।

पुत्रों का संग पाकर पी गई,

जीवन के दुख घोल कर ।

माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर …..

सत्यवान की चिंता में,

सावित्री ने शक्ति लगाई,

पति की उम्र बढ़ाने को ,

वो यम के पीछे आई।

थकी नहीं वो कन्या तब तक,

विजय ना पाई मौत पर,

माँ ने ऐसा feed किया ,

कुछ दूध में अपने घोल कर …..

मेवाड़ की पन्ना धाए को,

इतिहास भुला ना पाए।

रानी का वचन निभाने को,

सुत अर्पण कर आए।

अश्रु नयन में थाम खड़ी वो,

जैसे फूल हो शूल पर।

माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर…..

झांसी की रानी भी रण में,

बिगुल बजा कर आई,

पर वो माँ थी, पुत्र की चिंता,

उसके दिल में छाई।

बांध पीठ पर पुत्र को अपने,

चली युद्ध घुड़दौड पर।

माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर…..

इंदिरा ने भी देश की चिंता,

में थी जान गवाई,

माँ की इकलौती बेटी,

दुर्गा अवतार में आई,

दे गई खून का हर इक कतरा,

देश प्रेम में तोल कर ।

माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर…..

सदी बीसवीं में बेटी ने ,

माँ की छवि थी पाई।

मदर टेरेसा नाम से महिला,

दुनिया भर थी छाई।

सेवा – भाव से भारत आई ,

सीमाएं सब तोड़ कर।

माँ ने ऐसा feed किया

कुछ दूध में अपने घोल कर…..

अपने देश की एक कल्पना ,

थी आकाश में छाई ।

विज्ञान के रथ में बैठ के वो,

ऊंची उड़ान पर आई।

अपनों के मिलने से पहले,

सो गई यादें छोड़कर।

माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर,

सबकी चिंता रही उसे,

बस अपनी चिंता छोड़ कर।✍️

दादी के दोहे ,🤓

देखो मेरा मस्त कलंदर ,🎈
मूंछें लगा के बना सिकंदर।🎩
दौड़े सरपट बाहर अंदर,
जैसे राजा कोई धुरन्धर ।👑
मैं कहती हूँ आजा बन्दर,🐒
आजा कर लें, ‘सन्धि पुरंदर’ ।
तुझे खिलाऊँ मैं चुकन्दर,🍭
दोनो मिल फिर चलें जलंधर।
देखो मेरा मस्त कलंदर🎈
मूंछें लगा के बना सिकंदर।…✍️

भोगी राम।🙏

कभी कभी कोई व्यक्ति अपनी कर्तव्यनिष्ठा से इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वर्षों तक संपर्क टूट जाने पर भी वो अपने व्यक्तित्व की याद दिलाता रहता है ।
ऐसा ही एक व्यक्तित्व “चौकीदार भोगीराम” का तब सामने आ खड़ा होता है जब वर्षों बीत जाने के बाद वो आज भी अपनी उपस्थिति का अहसास कराता है ।
भोगीराम जिनकी ऊँची आवाज को किसी माइक की ज़रूरत नहीं थी । सफेद मूंछों एवं भारी भरकम कद काठी वाले भोगीराम का रुतवा ऐसा था कि विद्यालय के माननीय सचिव और प्रिंसिपल सर के समकक्ष उसे भी रखा जा सकता था। अगर आज भोगीराम के चेहरे का परिचय देना चाहूँ तो यही कहूँगी कि जब भी श्री मोहन भागवतजी को देखती हूँ तो भोगीराम की याद आ जाती है।
उनदिनों विद्यालय के चौकीदारों की कोई निश्चित यूनिफार्म नहीं थी पर भोगीरामजी अपने हल्के भूरे या सिलेटी सफारी सूट पोशाक में ही दिखाई देते । अपने साथ कुछ पक्षी पिंजड़े में लाते थे । शायद बटेर थे वो पक्षी ,जिन्हें विद्यालय के खेल मैदान के किनारे लगे पेड़ों की किसी एक शाखा पर टांग देते थे वो । इंटरवल में वो बटेर छोटे बच्चों का एक मनोरंजन होते थे।
कुछ बच्चों की आदत थी कि वे विद्यालय इंटरवल समाप्त होने के बाद ही पानी पीने नल के पास लाइन लगा लेते थे लेकिन भोगीरामजी के आते ही वे छूमंतर ही जाते ।
ग्यारहवी बारहवीं क्लास के जो छात्र विद्यालय समय में घर या कोचिंग जाने की जुगाड़ में रहते उनके लिए भोगीराम एक बड़ी बाधा थी जिसको पार करना आर्कमडीज के उस वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता के समान था जिसमें वो अपना प्रयोग सफल होते ही ‘ यूरेका ‘यूरेका’ चिल्लाया था।
मुझे याद है अपने रिटायरमेंट वाले दिन वो गले में फूलों की माला पहने छात्रों के सिर पर प्यार से हाथ रख रहे थे ।पहली बार भोगीराम जी को बच्चों से इतना घुलते मिलते देखा था ।
भोगीरामजी के सेवानिवर्ती के बाद ही विद्यालय की बाहरी दीवारें बहुत ऊंची कर दीं गईं थीं । सेकुरिटी भी बड़ा दी गई थी । विद्यालय के आंतरिक प्रवेशद्वार पर कोई दूसरा चौकीदारआ गया था फिर भी भोगीराम के जाने से एक सूनापन था । पेड़ की वो शाखा भी मौन थी जिसमें भोगीरामजी का पक्षी वाला पिंजड़ा लटका करता था । आज भी जब ‘ चौकीदार, शब्द सुनाई देता है तो अपने विद्यालय के गरिमामयी कर्तव्यनिष्ठ चौकीदार भोगीराम जी को प्रवेशद्वार में खड़ा पाती हूँ । 🙏 ✍️

पाठ अधूरा।

कितना भी परफेक्ट हो टीचर,
कुछ ही मिनट पढ़ाता है।
पीरियड ओवर होते ही,
फिर वापस वो हो जाता है ।
       ऐ मेरी ज़िंदगी बता तू ,
       कब तक मुझे पढ़ाएगी ?
       मेरे ही अनुभव से मुझको
       कब तक तू सिखलाएगी ।
माँ ने अंगुली थाम बरस में,
चलना मुझको सिख लाया,
और पिता भी कुछ महीनों में,
बोल मेरे होंठों तक लाया।
        पर कब तक तू, द्रोणाचार्य सी,
        एकलव्य को भरमाएगी?
        मांग तेरी पल पल में मेरे,
        अंगूठे तक हो जाएगी ।
अब तक तू जीवन का मेरे,
सार नहीं समझा पाई।
बस सुख दुख के इन जालों में,
तू मुझको उलझा ले आई ।
        अब तो स्याही खत्म कलम की,
        अब और न मैं लिख पाऊँगी।
         इस जीवन का पार कहां तक ,
         बिन जाने ही जाऊंगी ।
✍️

कोई दूर से आवाज दे ।😪

वो अक्सर महीने में दो बार आता saturday या sunday . एक साफ रंग वाला मोहिला सा युवक था वो कभाड़ी वाला । बिना ट्यूब टायर की उसकी साईकल की आवाज ही उसकी call bell थी ।
पैंट को अपनी पतली कमर में साधने के लिए नाड़े का उपयोग करता । belt नहीं रही होगी उसके पास । पहचान इतनी हो गई थी उस से कि वो बाहर का main gate खोल कर अंदर घर के कैंपस में स्वयं ही आ जाता ।
उस दिन उसके बारे में और भी जानकारी मिली थी जब घर के बरांडे में news papers तोलते तोलते वो जोर से चिल्लाया था “कभाड़ी वाला”। मैं हतप्रभ सी थी । घर में तोलते तोलते इतनी जोर से क्यों चिल्लाया था वो। हंसी भी आई थी उस पर । मैंने पूछा बहुत तल्लीन रहते हो अपने काम पर। शादी हो गई तुम्हारी ? वो हल्की सी आवाज में बोला ,’मैडम तीन बच्चे हैं मेरे । तीनों बेटियां हैं। उन्हीं के लिए ये काम करता हूँ। पहले सिमको फैक्ट्री में था। वो फैक्ट्री बन्द हो गई, फिर मूंगफली बेची ।उसमें कुछ नही मिलता था ।इसलिए ये काम शुरू किया था।’ मैंने कहा बहुत लगन है तुम में । एक दिन खूब पैसे वाले हो जाओगे। वो बोला ,’ अभी 28 साल की उम्र है मेरी ।आपकी दुआ रहे तो तीनों बेटियों को खूब पढ़ाऊंगा ।’
जुलाई का महीना था वो । घर में news papers बहुत इक्कट्ठा हो गए थे। उसने कहा था ,”किसी और को मत दिया करिए । मेरा तराजू चेक कर लो, मैं कभी भी गलत दाम नही लगाऊंगा।” उसी के नाम थे वो पेपर्स। सोचा था शायद गर्मी के कारण इतनी दूर ना निकला हो।
बड़ा suffocating दिन था वो । कॉलोनी कैंपस में आने वाले दूसरे कभाड़ी वाले ने बताया था, ‘वो संजू ? वो तो रहा नहीं। डेड़ दो महीने हो गया उसे गुजरे। उसे तो कुत्ते ने काट लिया था। पैसे की कमी से पूरे इंजेक्शन नहीं लगा पाया था वो । उसकी घरवाली अपने बच्चों के साथ गाँव चली गई थी ।’
न जाने क्यों वर्ष बीत गए उसकी मजबूरियों से भरी आवाज ‘कभाड़ी वाला’ आज भी कभी कभी दूर से सुनाई दे जाती है । 😪✍️

पंडित जी के जूते।

घर में दीदी का विवाह था। बड़ा उत्साह था विवाह में हम बच्चे उस समय बहुत उत्साहित थे । रात भर कन्यादान पूजा पाठ चलता रहा। कन्यादान के बाद सुबह कब हुई, पता ही नहीं चला । रात को सभी बहन भाइयों ने गुप्त meeting की थी। जीजाजी के जूते छुपाने की । कुछ बुद्धिमान भाई बहनों की duty लगा दी गई थी, इस काम में । अच्छी रकम मिलने की आशा थी क्यों कि हमारे नए जीजाजी आर्मी में captain थे । जूते ऐसी जगह छुपाए गए थे कि लाख कोशिशों के बाद भी कोई बाराती ढूंढ न पाता । घर के outer gate की hedges के बीच । हमने जूते छुपाई से मिलने की रकम बड़ी सुनियोजित तरीके से तय की थी ताकि सभी विवाह में उपस्थित 8-10 बहन भाइयों का हिस्सा बराबर हो सके। सवेरे 9 बजे बारात की विदाई थी। सब ओर शांति सी थी । अचानक पंडितजी की तेज आवाज बार बार सुनाई दी, अरे मेरे जूते कहां गए अरे मेरे जूते। लोग जूते ढूंढने लगे ।लोग पूछने लगे पंडितजी से, कहाँ उतारे थे जूते ? थोड़ी ही देर में जीजाजी भी सामने आ गए । ये क्या हो गया था दूल्हे जीजाजी ने तो जूते पहने हुए थे ।हमसे बड़ी भूल हो गई थी जिस कमरे में जीजाजी, पंडित जी और कुछ लोगों ने प्रवेश किया था।वहां सबसे नए जूतों को दूल्हे का समझ लिया था।
हम पंडित जी से क्या demand करते ।उन्हें चुपचाप से उनके जूते लाकर दे दिए थे । ✍️

मेरे अपने

इस दुनिया मे कितने आए,
कितने आकर चले गए।

कितने दिल मे बसे रहे,
कितनो को हम भूल गए ।

कितने फूलों की खुशबू से,
अब भी महका करते हैं।

कितने आंगन के पंछी बन,
अब भी चहका करते हैं।

जितने जलसे हुए खुशी में ,
बन आशीष ‘वो’ संग रहे।

यह जीवन होली सी रंगत ,
‘वो’ रंग की रंगत बने रहे।

जितने दिल मे आप बसे हो,
‘वो’ भी दिल मे बसे रहे।✍️
🌹💐❤️🙏

आज याद आ गयी

वैज्ञानिकों तुम्हारी जय हो तुमने पृथ्वी को प्रकाशित किया अपनी मेहनत और लगन से।आज अंधेरा करके दिया जलाकर आप की याद आ गई । आशा है फिर से आप कोरोना की medicine खोज निकाल कर इस तम को दूर करेंगे। 🙏